भारत की बढ़ती सामरिक शक्ति से पाकिस्तान घबराया
भारत से मुकाबला करने को बढ़ाया रक्षा बजट; ऑपरेशन सिंदूर से हार के बाद बौखलाया पाकिस्तान
इस्लामाबाद, 20 नवंबर (एजेंसियां)। पाकिस्तान सरकार ने ऐसे समय में रक्षा बजट में PKR 50 अरब (करीब ₹1,576 करोड़) की अचानक बढ़ोतरी की है, जब देश गहरे आर्थिक संकट, महंगाई और विदेशी कर्ज के बोझ से दबा हुआ है। लेकिन इस नाटकीय निर्णय के पीछे सबसे बड़ा कारण भारत की बढ़ती सैन्य शक्ति, समुद्री प्रभुत्व और हाल ही में भारतीय नौसेना के सफल ऑपरेशन सिंदूर का प्रभाव माना जा रहा है, जिसने पाकिस्तान की सामरिक सोच को हिला कर रख दिया है। भारत द्वारा हिंद महासागर क्षेत्र में स्थापित की जा रही नेतृत्वकारी भूमिका और आधुनिक हथियार प्रणाली के विस्तार ने इस्लामाबाद को अतिरिक्त सुरक्षा खर्च करने के लिए मजबूर कर दिया है।
पाकिस्तान की आर्थिक समन्वय समिति (ECC) ने नई राशि को अपने पहले से घोषित 2,550 अरब रुपये के रक्षा बजट के ऊपर मंज़ूरी दी है। यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया, जब IMF ने पाकिस्तान पर कड़े सुधार लागू किए हैं, ऊर्जा सब्सिडी लगभग समाप्त कर दी गई है और महंगाई 20 प्रतिशत से अधिक पहुँच चुकी है। इसके बावजूद सुरक्षा खर्च में वृद्धि इस बात का संकेत देती है कि भारत से सामरिक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने के डर ने पाकिस्तान की रणनीतिक प्राथमिकताओं को पूरी तरह बदल दिया है।
भारत ने हाल के वर्षों में जिस गति से रक्षा आधुनिकीकरण, नौसेनिक क्षमताओं, मिसाइल प्रणाली, ड्रोन नेटवर्क और समुद्री निगरानी तंत्र को मजबूत किया है, उससे पाकिस्तान स्पष्ट रूप से असहज है। ऑपरेशन सिंदूर, जिसमें भारतीय नौसेना ने अरब सागर में पाकिस्तान की संदिग्ध गतिविधियों पर अंकुश लगाते हुए कई महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त हासिल की थी, इस्लामाबाद के भीतर गहरी चिंता का कारण बना। पाक सैन्य नेतृत्व इस बात को समझ रहा है कि भारत की समुद्री शक्ति अब केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर उभरते नए शक्ति-संतुलन का हिस्सा बन चुकी है। यही कारण है कि पाकिस्तान नौसैनिक ठिकानों को अपग्रेड करने, सीमा फेंसिंग मजबूत करने और CPEC सुरक्षा तंत्र को और कठोर बनाने के लिए नई धनराशि लगा रहा है।
सुरक्षा व्यय में बढ़ोतरी के साथ-साथ पाकिस्तान ने दूसरा बड़ा कदम उठाया है—सिंध तट से 30 किलोमीटर दूर समुद्र में एक कृत्रिम ड्रिलिंग द्वीप बनाने की योजना। पाकिस्तान पेट्रोलियम लिमिटेड (PPL) द्वारा संचालित यह परियोजना ऑफशोर तेल और गैस खोज को तेज करने के उद्देश्य से आगे बढ़ाई जा रही है। हालांकि पाकिस्तान की समुद्री ऊर्जा खोज का इतिहास असफलताओं से भरा रहा है और 1947 से अब तक केवल 18 कुएँ ही खोदे जा सके हैं, जिनमें से अधिकांश विफल रहे। इसके बावजूद ट्रंप द्वारा हाल ही में किए गए “पाकिस्तान में विशाल तेल भंडार” के दावे ने इस परियोजना को नई गति दी।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान का यह ऊर्जा अभियान केवल आर्थिक उम्मीदों पर आधारित नहीं है, बल्कि इसमें सामरिक संदेश भी निहित है। यदि पाकिस्तान समुद्र में ऊर्जा खोज को सफल बनाता है, तो वह अरब सागर में अपनी उपस्थित मज़बूत कर भारत की समुद्री बढ़त को चुनौती देना चाहता है। हालांकि वास्तविकता यह है कि आर्थिक अस्थिरता के दौर में इस तरह की भारी परियोजनाएँ पाकिस्तान के लिए जोखिमपूर्ण साबित हो सकती हैं। कृत्रिम द्वीप निर्माण में 750 मिलियन से 1 अरब डॉलर तक का निवेश प्रस्तावित है, लेकिन सफलता की कोई गारंटी नहीं है।
भारत की दृष्टि से इस पूरे विकासक्रम का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि पाकिस्तान के कदम केवल आंतरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि भारत की सामरिक बढ़त का प्रतिरोध करने की रणनीति का हिस्सा दिखाई देते हैं। अफगानिस्तान–ईरान सीमा पर नई फेंसिंग, CPEC सुरक्षा के लिए विशेष डिविज़न, नौसैनिक ठिकानों का उन्नयन, ऑफशोर ऊर्जा खोज, अमेरिका और चीन दोनों की संभावित भूमिका—ये सभी संकेत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि पाकिस्तान अपने सामरिक ढांचे का पुनर्गठन कर रहा है ताकि भारत के दीर्घकालिक प्रभुत्व को चुनौती दे सके। लेकिन आर्थिक कमजोरी और राजनीतिक अस्थिरता इस रणनीति को टिकाऊ बनाने में पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा अवरोध बनी हुई है।
फिलहाल पाकिस्तान जिस दोहरी रणनीति पर चल रहा है—एक तरफ सुरक्षा का आक्रामक विस्तार और दूसरी तरफ ऊर्जा आत्मनिर्भरता की खोज—वह देश की आर्थिक हालत के हिसाब से अत्यंत जोखिम भरी है। रक्षा खर्च में तेज़ वृद्धि पाकिस्तान के वित्तीय सुधारों को और प्रभावित कर सकती है, जबकि ऑफशोर अभियान असफल हुआ तो देश की आर्थिक हालत और बदतर हो सकती है। लेकिन यह स्पष्ट है कि भारत की बढ़ती सामरिक शक्ति और ऑपरेशन सिंदूर की सफलता ने पाकिस्तान को अपनी सुरक्षा नीति पूरी तरह बदलने पर मजबूर कर दिया है। आने वाले वर्षों में इन फैसलों का असर न केवल पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के सामरिक संतुलन को प्रभावित करेगा।

