नई दिल्ली, 28 नवंबर (एजेंसियां)।कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद को लेकर जारी सत्ता-संघर्ष एक बार फिर गरमा गया है। राज्य के उपमुख्यमंत्री और कर्नाटक कांग्रेस के कद्दावर नेता डीके शिवकुमार ने शुक्रवार को अपने सार्वजनिक भाषण में पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के 2004 के ‘त्याग’ का जिक्र कर सियासी संकेत दिए। यह बयान ऐसे समय आया है जब सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच सत्ता-साझाकरण को लेकर तनाव चरम पर है और दिल्ली में इस मुद्दे पर होने वाली महत्वपूर्ण बैठक से पहले राजनीतिक हलकों में चर्चाएँ तेज हो गई हैं।
बेंगलुरु में एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान शिवकुमार ने सोनिया गांधी की उस ऐतिहासिक भूमिका को याद किया, जब उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के आग्रह के बावजूद प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने से इनकार कर दिया था और इसके बजाय पार्टी हित तथा राष्ट्र की स्थिरता को प्राथमिकता देते हुए मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाया था। शिवकुमार ने कहा कि सोनिया गांधी ने न केवल व्यक्तिगत शक्ति का त्याग किया, बल्कि संगठन और देश को सर्वोपरि रखा, जो कांग्रेस की परंपरा और मूल्यों की पहचान है।
अपने संबोधन में शिवकुमार ने सोनिया गांधी के लंबे राजनीतिक कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि वह 20 वर्षों तक कांग्रेस अध्यक्ष रहीं और इस दौरान उन्होंने सत्ता से अधिक संगठन को महत्व दिया। इसी संदर्भ में उन्होंने कर्नाटक की जनता से सिद्धारमैया के नेतृत्व में कार्यरत कांग्रेस सरकार का समर्थन जारी रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार राज्य के विकास के लिए प्रतिबद्ध है और जनता के कल्याण के लिए हर संभव प्रयास करती रहेगी। शिवकुमार ने लोगों से आग्रह किया कि वे 2028 के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस को मजबूती देने के लिए अपना आशीर्वाद बनाए रखें।
शिवकुमार का यह बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि उनके और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बीच यह विवाद लंबे समय से चल रहा है कि सत्ता हस्तांतरण कब और किस फार्मूले के तहत होगा। चुनाव के समय यह संकेत दिए गए थे कि दोनों नेताओं के बीच कार्यकाल साझा करने का एक समझौता हुआ था, लेकिन अब तक इस पर कोई स्पष्ट निर्णय नहीं हुआ है। कई विधायकों की हालिया मुलाकातों और अंदरूनी चर्चा ने भी इस विवाद को और हवा दी है।
दिल्ली में होने वाली बैठक को इस पूरे घटनाक्रम में निर्णायक माना जा रहा है। बैठक में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के शामिल होने की संभावना है। उम्मीद जताई जा रही है कि यह नेतृत्व कर्नाटक में जारी खींचतान को समाप्त करने के लिए एक ठोस समाधान निकाल सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवकुमार का सोनिया गांधी के त्याग की मिसाल देने का उद्देश्य पार्टी नेतृत्व पर भरोसा जताना और यह संदेश देना है कि संकट का समाधान संगठनात्मक मूल्यों के दायरे में ही खोजा जाना चाहिए।
अपने भाषण के अंत में शिवकुमार ने स्पष्ट रूप से सिद्धारमैया के नेतृत्व का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि सरकार का काम जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरना है और इसके लिए एकता व स्थिरता जरूरी है। उन्होंने जनता को संबोधित करते हुए कहा कि उनका आशीर्वाद कांग्रेस सरकार पर बना रहे और पार्टी राज्य के हर नागरिक के जीवन में उजाला फैलाने का प्रयास जारी रखेगी। यह बयान उनके राजनीतिक रुख को संतुलित करता दिखा—जहाँ एक ओर वह सत्ता-साझाकरण पर अपनी दावेदारी बनाए रखते हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार की निरंतरता और पार्टी की एकजुटता का संदेश भी देते हैं।
कर्नाटक में वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों से यह स्पष्ट है कि आगामी दिनों में कांग्रेस नेतृत्व को महत्वपूर्ण रणनीतिक निर्णय लेने होंगे। मुख्यमंत्री पद को लेकर उठ रहे सवालों और शक्ति संतुलन के बीच पार्टी के लिए चुनौती यह होगी कि वह संगठनात्मक समरसता बनाए रखते हुए सरकार की स्थिरता और जनता का विश्वास कायम रख सके। शिवकुमार के ताज़ा बयान ने सियासी बहस को और रोचक बना दिया है और सबकी निगाहें अब दिल्ली में होने वाली उस अहम बैठक पर टिक गई हैं, जहाँ से कर्नाटक की राजनीति की अगली दिशा तय हो सकती है।

