“एक हिंदू के सामने 90 हजार पाकिस्तानी फौजी झुके थे”

भारत की ताकत पर पाकिस्तान का बड़ा खुलासा! मौलाना फजलुर रहमान बोले—

“एक हिंदू के सामने 90 हजार पाकिस्तानी फौजी झुके थे”

पाकिस्तान के शक्तिशाली मौलाना ने फोड़ा ‘सच का बम’, बोले—1971 में पूरी पाक सेना ने देश की इज्जत मिट्टी में मिलाई

नई दिल्ली, 28 नवंबर (एजेंसियां)।पाकिस्तान में एक बार फिर राजनीतिक हलचल तब तेज हो गई जब जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (एफ) के प्रमुख और पूर्व सांसद मौलाना फजलुर रहमान ने भारत को लेकर ऐसा खुलासा कर दिया जिसने पाकिस्तान की सियासत ही नहीं, पूरे समाज को झकझोर दिया है। अपने तीखे और आग भड़काने वाले बयानों के कारण आमतौर पर ‘मौलाना डीजल’ के नाम से मशहूर फजलुर रहमान ने भारत की सैन्य क्षमता और पाकिस्तान की ऐतिहासिक पराजय पर खुलकर बात करते हुए कहा कि 1971 की जंग में पाकिस्तान ने अपनी इज्जत खुद नीलाम कर दी थी। उनका बयान पाकिस्तान में इतने सालों से दबी सच्चाई को एक बार फिर उजागर कर रहा है, जिससे वहां की जनता और सत्ता दोनों की बेचैनी बढ़ गई है।

फजलुर रहमान ने कहा कि भारत की असली ताकत उसके अनुशासन, सैन्य रणनीति और नेतृत्व में है। उन्होंने साफ कहा कि 1971 के युद्ध में “एक हिंदू भारतीय जनरल के सामने 90 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने हथियार डाल दिए।” उनका इशारा भारत के तत्कालीन पूर्वी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा की ओर था, जिनके सामने पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल ए.ए.के. नियाज़ी ने आत्मसमर्पण किया था। रहमान के अनुसार वह क्षण ऐसा था जिसने पाकिस्तान की नाक काटकर दुनिया के सामने रख दी।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की सेना और नेतृत्व ने देश को ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया जहाँ से सम्मान की वापसी नामुमकिन हो गई। रहमान ने आरोप लगाया कि जिन लोगों ने देश को इस स्थिति में धकेला वही आज खुद को “नायक” दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जनता सब जानती है और अब उनके झूठ नहीं चलेंगे। उन्होंने यह टिप्पणी ऐसे समय में की है जब पाकिस्तान में सेना की भूमिका, राजनीतिक अस्थिरता और जनता की असंतुष्टि लगातार बढ़ रही है।

मौलाना डीजल ने न केवल 1971 की हार को पाकिस्तान का सबसे बड़ा कलंक बताया, बल्कि यह भी कहा कि इस हार ने पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमजोर राष्ट्र के रूप में स्थापित कर दिया। फजलुर रहमान लंबे समय से पाकिस्तान की सत्ता प्रणाली और सैन्य प्रतिष्ठान के कटु आलोचक रहे हैं। वे इमरान खान के भी प्रखर विरोधी हैं और 2019 में उनके नेतृत्व में ‘आज़ादी मार्च’ ने पाकिस्तान में राजनीतिक भूचाल ला दिया था।

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फजलुर रहमान यहीं नहीं रुके। उन्होंने संसद में पहले भी एक बड़ा खुलासा किया था कि बलूचिस्तान के कई जिले खुद को स्वतंत्र घोषित करने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो संयुक्त राष्ट्र बलूचिस्तान को खुद एक अलग देश के रूप में मान्यता दे सकता है। उनका कहना था कि यह वही स्थिति होगी जो 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) के टूटने के समय पैदा हुई थी। रहमान का दावा है कि पाकिस्तान का केंद्रीय ढांचा धीरे-धीरे दरक रहा है और यह स्थिति पाकिस्तान के भविष्य के लिए भयावह है।

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भारत के संदर्भ में उनके बयान से पाकिस्तान की असुरक्षा, राजनीतिक अराजकता और ऐतिहासिक शर्म को एक साथ उजागर किया गया है। पाकिस्तान में सेना और राजनीतिक वर्ग हमेशा 1971 के कारणों पर पर्दा डालने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन मौलाना के इस बयान ने एक बार फिर उस सच्चाई को सामने ला दिया कि पाकिस्तान की हार महज सैन्य पराजय नहीं, बल्कि राष्ट्र के चरित्र और नेतृत्व की कमजोरी का परिणाम थी।

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फजलुर रहमान के बयान पर पाकिस्तान में तीखी प्रतिक्रिया हो रही है। लेकिन इस हड़कंप के बीच एक बड़ी सच्चाई सामने आती है—पाकिस्तान का अंदरूनी संकट इतना गंभीर है कि उसके नेता अब खुद अपने देश की कमजोरियों को दुनिया के सामने उजागर करने लगे हैं। इस बयान से पाकिस्तान की जनता और राजनीतिक वर्ग दोनों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—क्या पाकिस्तान अपने इतिहास से सीख लेगा या फिर वही गलतियाँ दोहराता रहेगा?

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