सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार को खुली चुनौती

जब-जब जुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा: मदनी के विस्फोटक बयान से देश में हलचल

सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार को खुली चुनौती

मौलाना मदनी के जिहादी बयान पर राजनीतिक भूचाल, भाजपा ने कहा—यह खुली धमकी और देश को बांटने की कोशिश

नई दिल्ली, 29 नवम्बर,(एजेंसियां)। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने एक बार फिर ऐसा बयान दे डाला है, जिसने देश की राजनीति में तूफ़ान ला दिया है। मदनी ने खुली धमकी भरे अंदाज़ में कहा—“जब-जब जुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा”। यह बयान न सिर्फ विवादास्पद है बल्कि सीधे-सीधे देश की सर्वोच्च अदालत और केंद्र सरकार को चुनौती देने जैसा है। भाजपा ने इसे एक खतरनाक उकसावे और मुस्लिम समाज को भड़काने की साजिश बताया है।

मदनी यहीं नहीं रुके। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की नीयत और उसकी स्वतंत्रता पर भी सवाल उठा दिए। उनका आरोप है कि तीन तलाक, बाबरी मस्जिद और अन्य धार्मिक मामलों में आये फैसले “सरकारी दबाव” में हुए हैं। ऐसे आरोप न सिर्फ न्यायपालिका की गरिमा पर हमला हैं बल्कि संवैधानिक व्यवस्था पर कुठाराघात भी। मदनी के इस अपमानजनक रवैये को भाजपा नेताओं ने राष्ट्र विरोधी बताया है और कहा कि यह देश के बहुसंख्यक समाज को उकसाने की सुनियोजित रणनीति है।

मदनी ने दावा किया कि कई फैसले “अल्पसंख्यकों के अधिकारों का उल्लंघन” करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि कानून और संविधान के दायरे में दिए गए फैसलों को “जिहाद” से जोड़ने की क्या मंशा है? क्या वह न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं? या अल्पसंख्यक समाज के भीतर भय पैदा करके राजनीति चमकाने की?

उन्होंने 1991 के उपासना स्थल अधिनियम का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके बावजूद अदालतों में मामले चल रहे हैं, जो संविधान से विचलन दर्शाते हैं। आगे उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की गरिमा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह तभी तक ‘सर्वोच्च’ है जब तक “वह संविधान की रक्षा” करे। यह बयान न सिर्फ राजनीतिक रूप से उकसाने वाला है बल्कि न्यायपालिका को धमकाने जैसा है। देश में किसी धार्मिक नेता द्वारा सुप्रीम कोर्ट को इस स्तर पर चुनौती देना अभूतपूर्व है।

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इसके बाद मदनी ने एक और सनसनीखेज दावा किया। उन्होंने कहा कि देश की 10 प्रतिशत जनसंख्या मुसलमानों के पक्ष में है, 30 प्रतिशत उनके खिलाफ है और 60 प्रतिशत चुप है। उन्होंने मुसलमानों से कहा कि वे इस शांत बहुसंख्यक वर्ग को “अपने मुद्दे समझाएं”, क्योंकि अगर ये 60% लोग भी उनके खिलाफ हो गए तो “देश में बहुत बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा”। इस कथन को भाजपा ने साफ तौर पर एक छिपी धमकी बताया है—जो सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचाने की कोशिश है।

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मदनी ने मीडिया और सरकार पर “जिहाद” शब्द को बदनाम करने का आरोप लगाया और लव जिहाद, थूक जिहाद, भूमि जिहाद जैसे शब्दों के इस्तेमाल की निंदा की। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि ये शब्द किसी धार्मिक अवधारणा पर नहीं, बल्कि देशभर में सामने आए उन मामलों पर आधारित हैं जिनमें ऐसी गतिविधियों के प्रमाण जांच एजेंसियों और अदालतों में प्रस्तुत हुए। देश में जिहाद शब्द को लेकर संवेदनशीलता पहले से ही मौजूद है, ऐसे में मदनी का बयान शांति के बजाय उत्तेजना की जमीन तैयार करता है।

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भाजपा नेताओं ने पलटवार करते हुए कहा कि मदनी जैसे लोग बार-बार भड़काऊ भाषण देकर देश की एकता को चुनौती देते हैं। कई भाजपा नेताओं ने कहा कि यह बयान धार्मिक उग्रवाद को बढ़ावा देने वाला है और संवैधानिक संस्थाओं का अपमान है। गिरिराज सिंह ने तो इसे सीधे “जिन्ना की लाइन पर चलने वाला जहरीला बयान” बताया। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी मदनी को करारा जवाब देते हुए कहा कि भारत किसी भी प्रकार के उग्रवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा और संविधान सर्वोपरि है, किसी मौलाना की धमकी से नहीं हिलेगा।

मदनी का बयान ऐसे समय में आया है जब देश में राम मंदिर, समान नागरिक संहिता, जनसंख्या नियंत्रण और कई धार्मिक मुद्दों पर चर्चा तेज है। ऐसे में उनकी टिप्पणी को मुस्लिम राजनीति के एक नए दबाव-तंत्र के रूप में देखा जा रहा है—जहां अदालतें और सरकारें उनकी विचारधारा के अनुसार काम न करें तो वे “जिहाद” जैसी शब्दावली सामने ले आते हैं। यह लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए चिंताजनक स्थिति है।

मदनी की बयानबाजी से यह स्पष्ट है कि उनकी राजनीति अब खुलेआम आक्रामक हो चुकी है। पर सवाल यह है कि क्या वह मुस्लिम समाज के वास्तविक मुद्दों पर बात कर रहे हैं—या एक बार फिर मुसलमानों को भय के नाम पर लामबंद करने की पुरानी राजनीति शुरू हो गई है?

भारत का संविधान सबको समान अधिकार देता है। लेकिन जब कोई नेता—वह किसी भी धर्म का हो—सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार को “जुल्म” कहकर धमकी दे, उसे लोकतंत्र में स्वीकार नहीं किया जा सकता। मदनी का बयान न सिर्फ सामाजिक सद्भाव को चोट पहुंचाता है बल्कि न्यायिक व्यवस्था को भी चुनौती देता है। आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है।

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