भारत से हजारों यहूदियों को ले जा रहा है इज़राइल, मुस्लिम देशों में मचा हड़कंप
इज़राइल की ऐतिहासिक कार्रवाई से पश्चिम एशिया में तेज हुई घबराहट, भारत-इज़राइल संबंध हुए और प्रबल
नई दिल्ली, 29 नवम्बर,(एजेंसियां)। युगों युगों से “वसुधैव कुटुंबकम” के सिद्धांत का पालन करने वाला भारत आज एक ऐसे परिवर्तन का गवाह बन रहा है, जिसकी आहट पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया तक सुनाई दे रही है। दुनिया जानती है कि भारत ने हर सताए हुए, हर विस्थापित और हर बेघर समुदाय को अपना माना है। यहूदी हों, पारसी हों या तिब्बती बौद्ध—भारत ने कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाया। लेकिन अब सदियों से भारत के पूर्वोत्तर में शांतिपूर्वक रह रहा यहूदी समुदाय अपने मूल-देश इज़राइल की पुकार पर वापस लौटने जा रहा है। यह कदम केवल भावनात्मक नहीं बल्कि भू-राजनीतिक समीकरणों को झकझोर देने वाला साबित हो सकता है। यही वजह है कि यह खबर आते ही कई मुस्लिम देशों में बेचैनी, चिंता और खलबली साफ दिखाई दे रही है।
इज़राइल ने भारत को लेकर जो फैसला लिया है, उस पर दुनिया की नज़रें टिकी हैं। 2700 वर्षों के इंतज़ार के बाद इज़राइल ने भारत के बिनई मिनाशे समुदाय को आधिकारिक रूप से अपने देश बुलाने का निर्णय लिया है। इज़राइल सरकार ने पूर्वोत्तर भारत में बसे 5800 यहूदियों को अगले पांच वर्षों में इज़राइल में बसाने की ऐतिहासिक मंजूरी दी है। यह घोषणा इज़राइल की सुरक्षा रणनीति, जनसांख्यिकीय संतुलन और सीमाई इलाकों पर अपनी पकड़ को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है। यह कोई साधारण पुनर्वास अभियान नहीं, बल्कि इज़राइल की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का अहम अध्याय साबित होने वाला है।
भारत के लिए यह भावनात्मक क्षण इसलिए भी है क्योंकि यह वही लोग हैं जिनकी पीढ़ियाँ भारत की मिट्टी में पली-बढ़ी, लेकिन जिन्होंने अपने धार्मिक इतिहास में इज़राइल को अपनी अंतिम मंज़िल माना। इज़राइल ने इन लोगों को उत्तर इज़राइल के गलील क्षेत्र में बसाने की योजना तैयार कर ली है। यहां उन्हें हिब्रू भाषा सिखाई जाएगी, रहने के लिए घर दिया जाएगा, रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा और सभी को इज़राइल के सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों से जोड़ा जाएगा। अगले साल यानी 2026 में इस समुदाय के पहले 1200 सदस्य इज़राइल पहुंचेंगे और इसके बाद यह प्रक्रिया चरणबद्ध रूप से आगे बढ़ेगी।
इस फैसले का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक संदेश यह है कि इज़राइल अपने सीमावर्ती इलाकों पर यहूदियों की जनसंख्या बढ़ाने की दिशा में खुलकर आगे बढ़ चुका है। इज़राइल जानता है कि यदि उसके सीमा क्षेत्रों में फिलिस्तीनी आबादी अधिक होती गई, तो आने वाले वर्षों में यह सैन्य और रणनीतिक दृष्टि से भारी खतरा बन सकती है। इज़राइल की योजना है कि उसकी सेना को सीमा पर न सिर्फ भौगोलिक सुरक्षा मिले बल्कि स्थानीय यहूदी आबादी भी उन्हें सहयोग करे। यह फैसला उन मुस्लिम देशों के लिए चुभन का कारण बन गया है जो हमेशा इज़राइल के जनसंख्या संतुलन को लेकर विरोध में रहे हैं। इज़राइल जिस दिशा में बढ़ रहा है, वह उसके दुश्मनों को परेशान करने के लिए काफी है।
इज़राइल की यह कार्रवाई भारत की विदेशी नीति और उसके सांस्कृतिक इतिहास से भी जुड़ती है। भारत में बसे यहूदी समुदाय को कभी भी संदेह, प्रतिबंध या नफरत का सामना नहीं करना पड़ा। यही वजह है कि इज़राइल की सरकार इस समुदाय को “सबसे सुरक्षित और सम्मानित यहूदी प्रवासी” मानती आई है। इज़राइल के कई पूर्व राजनयिक पहले भी इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार चुके हैं कि भारत में यहूदियों को हमेशा सम्मान मिला और यही कारण है कि भारत-इज़राइल संबंध वर्षों से अभूतपूर्व ऊंचाई पर रहे हैं। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का वह कथन आज भी गूंजता है—“भारत ने कभी भी किसी शरण मांगने वाले को खाली हाथ नहीं लौटाया।”
इसी ऐतिहासिक संदर्भ के साथ यह फैसला और भी अहम हो जाता है। बिनई मिनाशे समुदाय को इज़राइल बुलाने की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही दुनिया भर के प्रमुख यहूदी धर्मगुरुओं की सबसे बड़ी टीम भारत के पूर्वोत्तर दौरे पर आने वाली है। यह टीम बिनई मिनाशे समुदाय के साथ धार्मिक, सांस्कृतिक और पुनर्वास संबंधी महत्वपूर्ण बैठकों में भाग लेगी। यह दौरा केवल औपचारिकता नहीं बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक और ऐतिहासिक पुनर्स्थापना का प्रतीक है।
इस पूरी प्रक्रिया को लेकर मुस्लिम देशों में हड़कंप इसलिए मचा हुआ है क्योंकि इज़राइल जिस दिशा में बढ़ रहा है, उसका सीधा संबंध उसकी सुरक्षा और क्षेत्रीय राजनीति से है। फिलिस्तीनी समूहों को यह डर सता रहा है कि यदि इज़राइल ने सीमावर्ती इलाकों में बड़ी संख्या में यहूदियों को बसाने की नीति जारी रखी, तो भविष्य में उनकी जनसंख्या संतुलन रणनीति पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी। यही कारण है कि इस फैसले के बाद इज़राइल-विरोधी देशों की प्रतिक्रियाएँ बेहद कड़ी और बेचैन करने वाली रही हैं।
दूसरी ओर भारत के लिए यह फैसला किसी चोट के समान नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक स्वीकार्यता जैसा है। भारत से जाने वाले यहूदी अपने साथ इस देश की संस्कृति, प्रेम और अपनापन लेकर जाएंगे। वे भारत के इतिहास का हिस्सा हमेशा रहेंगे और भारत-इज़राइल संबंधों की मजबूती का प्रतीक भी। भारत ने सदैव अपने द्वार खुले रखे और आज इज़राइल उसी परंपरा का सम्मान करते हुए इन समुदायों को उनकी धार्मिक पहचान और विरासत के आधार पर वापस बुला रहा है।
इज़राइल का यह कदम आने वाले समय में दक्षिण एशिया और मध्यपूर्व दोनों में जनसांख्यिकीय राजनीति, सुरक्षा समीकरण और कूटनीतिक रिश्तों को नए रूप में आकार देगा। दुनिया देख रही है कि इज़राइल अब केवल युद्ध के मोर्चे पर नहीं बल्कि जनसंख्या रणनीति के मोर्चे पर भी आक्रामक होकर खेल रहा है। और यह आक्रामकता कई राष्ट्रों को हिलाने के लिए काफी है।

