मुश्किल में कराह रहा था अफगानिस्तान, तभी भारत ने उतार दिया अपना विमान
— दुनिया हैरान, तालिबान भी चुप
6.3 तीव्रता के भूकंप ने उत्तरी अफगानिस्तान को दहलाया, भारत सबसे पहले मदद लेकर पहुंचा
नई दिल्ली, 29 नवम्बर,(एजेंसियां)। अफगानिस्तान एक बार फिर प्रकृति के भारी प्रकोप के नीचे दब गया। उत्तरी इलाकों में 6.3 तीव्रता का भीषण भूकंप आया जिसने पूरे क्षेत्र को हिलाकर रख दिया। मौतों का आंकड़ा बढ़ रहा है, घायल लोगों की चीखें मीलों दूर तक सुनी जा सकती हैं और देश की ऐतिहासिक धरोहरें भी इस झटके की ताकत के सामने टिक न सकीं। मजार-ए-शरीफ की मशहूर ब्लू मस्जिद, जिसकी नीली टाइलें सदियों से इतिहास की गवाही दे रही थीं, वह भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। अस्पतालों में दवाइयाँ खत्म, सड़कों पर अफरा-तफरी और लोगों में दहशत—अफगानिस्तान एक ऐसे संकट में फँस चुका था जिसमें उसे किसी मजबूत हाथ की जरूरत थी।
इसी नाजुक घड़ी में दुनिया का कोई भी बड़ा मुस्लिम देश आगे आने में असफल रहा, लेकिन भारत ने बिना किसी देरी के अपना विशेष विमान काबुल भेज दिया। भारत का यह कदम न केवल राहत बल्कि मानवता की सबसे बड़ी मिसाल बनकर सामने आया। 73 टन जीवन रक्षक दवाइयां, वैक्सीन, मेडिकल किट और प्रोटीन सप्लीमेंट से भरा विमान जैसे ही अफगान जमीन पर उतरा, यह साफ हो गया कि भारत केवल कूटनीतिक साझेदार नहीं बल्कि संकट में सबसे पहले साथ देने वाला सच्चा मित्र है। भारत ने भूकंप से प्रभावित परिवारों के लिए हजारों किलो भोजन भी भेजा, जिससे भूखे पड़े सैकड़ों परिवारों को राहत मिल सकी।
अफगानिस्तान में हालात इतने भयावह थे कि अस्पतालों के बाहर घायल लोग लाइन लगाकर पड़े थे। दवाइयां खत्म हो चुकी थीं और डॉक्टरों के पास साधन नहीं थे। बच्चे बिना इलाज के तड़प रहे थे और महिलाएँ खुले आसमान के नीचे रातें काट रही थीं। इस पूरी त्रासदी के बीच भारत ने सबसे तेज प्रतिक्रिया दी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट कहा कि भारत ने अफगानिस्तान की जरूरतों को पहचानते हुए जल्द से जल्द मेडिकल सप्लाई भेजने का फैसला लिया। कंटेनर में भेजी गई सामग्री में एंटीबायोटिक्स, वैक्सीन, आपातकालीन चिकित्सा किट और आवश्यक पोषक तत्व शामिल थे।
यह पहला मौका नहीं था जब भारत अफगानिस्तान के दर्द में खड़ा हुआ। 3 नवंबर को भी भारत ने बड़ी मात्रा में भोजन सामग्री भेजी थी जो भूकंप प्रभावित परिवारों के लिए जीवन रेखा साबित हुई। जयसवाल ने साझा की गई तस्वीरों के साथ लिखा—“India delivers. India the first responder.” यह केवल एक वाक्य नहीं बल्कि भारत की विश्व नेतृत्व क्षमता का प्रमाण है। भू-राजनीतिक तनावों के बीच जब कई देश केवल बयान जारी कर रहे थे, भारत जमीन पर उतरकर काम कर रहा था।
इस बीच एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी सामने आया कि भारत की इस तेज और निर्णायक कार्रवाई ने भू-राजनीतिक समीकरणों को भी बदल दिया है। इंडो-पैसिफिक इंस्टीट्यूट के सीनियर सलाहकार डेरेक जे ग्रॉसमैन ने कहा कि तालिबान मंत्री मुत्तकी और उसके बाद अजीजी का भारत दौरा यह संकेत है कि नई दिल्ली की रणनीति बिल्कुल सही दिशा में जा रही है। भारत न केवल मानवीय सहायता दे रहा है बल्कि अफगानिस्तान में अपनी पकड़ फिर से मजबूत कर रहा है। वर्षों बाद भारत को यह अवसर मिला है कि वह अफगानिस्तान में अपनी भूमिका और प्रभाव को फिर से स्थापित कर सके—और यह सब उस समय हो रहा है जब पाकिस्तान की पकड़ कमजोर होती जा रही है।
भारत ने केवल सामान भेजकर औपचारिकता नहीं निभाई। विदेश मंत्री अजय शंकर ने सीधे अफगानिस्तान के विदेशी मंत्री से फोन पर बातचीत कर शोक संवेदना व्यक्त की और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया। यह वार्ता भारत की संवेदनशील और प्रभावी कूटनीति को दर्शाती है। तालिबान सरकार भी जानती है कि ऐसे कठिन समय में भारत ही वह देश है जिस पर भरोसा किया जा सकता है।
अफगानिस्तान में भूकंप ने केवल इमारतें नहीं गिराईं, बल्कि व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और शासन की पोल भी खोलकर रख दी। वहीं भारत का कदम साबित करता है कि वह केवल एक उभरती वैश्विक शक्ति नहीं बल्कि वह राष्ट्र है जो मानवता को प्राथमिकता देता है। पाकिस्तान से लेकर तुर्की तक कई मुस्लिम देश जहाँ शब्दों में अफगानिस्तान के लिए संवेदना दिखा रहे थे, वहीं भारत ने जमीनी समर्थन देकर सारी दुनिया को चौंका दिया।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात बिल्कुल साफ कर दी—भारत अब वही देश नहीं रह गया जो केवल सीमित कूटनीति तक सीमित था। आज भारत संकट में सबसे पहले कदम बढ़ाने वाला, भू-राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने वाला और मानवीय सहायता में अग्रणी वैश्विक शक्ति बन चुका है। अफगानिस्तान की मिट्टी पर उतरा भारत का विमान सिर्फ राहत सामग्री लेकर नहीं आया, वह एक संदेश लेकर आया—भारत दोस्त है, पड़ोसी है, और संकट में सबसे पहले खड़े होने वाला राष्ट्र है।

