बिहार का हश्र देखकर घबराए अखिलेश!
सपा प्रमुख का तीखा सवाल, लेकिन असली वजह राजनीतिक डर?
SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाकर 2027 की हार से बचने की कोशिश?
लखनऊ, 29 नवम्बर,(एजेंसियां)। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव इन दिनों अचानक विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर – Special Intensive Revision) प्रक्रिया पर हमलावर हो गए हैं। उन्होंने चुनाव आयोग पर आरोप लगाया कि एसआईआर प्रक्रिया जल्दबाजी में करवाई जा रही है और कर्मचारियों पर असामान्य दबाव बनाया जा रहा है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अखिलेश की यह ‘चिंता’ सीधे-सीधे उनकी राजनीतिक बेचैनी का संकेत है—खासकर तब, जब बिहार में एसआईआर लागू होते ही लाखों फर्जी वोटों की पहचान सामने आ गई और विशाल पैमाने पर नाम हटे। यही दृश्य उत्तर प्रदेश के 2027 चुनाव से पहले सपा को डरा रहा है।
अखिलेश यादव ने फतेहपुर में उस सुपरवाइजर के परिवार से मुलाकात के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि अधिकारी पर दबाव था और इसी कारण उसने आत्महत्या की। यादव ने सवाल उठाया कि आखिर इतनी जल्दी क्या थी और चुनाव आयोग के कर्मचारियों की मदद कौन करेगा? उन्होंने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि लोग कह रहे हैं कि “चुनाव आयोग के हाथ खून से सने हैं।”
लेकिन राजनीतिक हलकों में यह सवाल भी जोर पकड़ रहा है—क्या अखिलेश यूपी में होने वाले ‘बिहार जैसे बड़े खुलासे’ से पहले ही घबरा गए हैं? क्या उनकी बेचैनी का कारण वह बड़ा मतदाता आधार है, जो अब एसआईआर में फर्जी, दोहरे या मृतक पाए जाने की संभावनाओं के अंतर्गत आ रहा है?
बिहार में लाखों फर्जी नाम हटे, इसी मॉडल से क्यों परेशान सपा?
कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने भी एसआईआर प्रक्रिया पर चिंता जताई, लेकिन उन्होंने स्वयं यह स्वीकार किया कि पहले कभी एसआईआर को लेकर ऐसी घबराहट नहीं देखी गई। इस बार लोगों में जो तनाव है, वह असल में उन राज्यों में हो रहे व्यापक सुधारों की वजह से है जहाँ मतदाता सूची में वर्षों से जमा अनियमितताओं को पहली बार तेजी से सुधारा जा रहा है। बिहार में तो स्थिति यह रही कि लाखों नाम हटे और बूथों पर वोट बैंक की ‘कृत्रिम तसवीर’ एक झटके में साफ दिखाई देने लगी। यही डर अब कुछ दलों को उत्तर प्रदेश में भी महसूस हो रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सपा की कमजोरी उन इलाकों में खुल सकती है जहाँ परंपरागत वोटरों की संख्या कागजों में तो अधिक दिखती है लेकिन वास्तविकता में वह आंकड़ा अलग है। यही स्थिति 2027 के लिए अखिलेश को परेशान करने लगी है। इसलिए वह एसआईआर प्रक्रिया को मुद्दा बनाकर इसे राजनीतिक बहस में बदलने का प्रयास कर रहे हैं।
सपा के तेवर तेज, लेकिन सवाल वही—एफ़रातफ़री क्यों?
अखिलेश यादव बार-बार कहते हैं कि एसआईआर जल्दबाजी में हो रहा है। उनका दावा है कि इससे कर्मचारियों पर दबाव पड़ रहा है और कई अधिकारियों ने तनाव में आत्महत्या तक कर ली। उन्होंने चुनाव आयोग से मृत अधिकारियों के परिजनों को एक करोड़ का मुआवज़ा देने की मांग भी की है। उनकी चिंता कर्मचारियों के लिए हो सकती है, लेकिन एसआईआर के विरोध की तीव्रता राजनीतिक रूप से कई अन्य संकेत भी दे रही है।
जब बिहार में एसआईआर ने बड़े पैमाने पर मतदाता सूची को साफ किया, तब विपक्षी दलों की पहली प्रतिक्रिया यही थी कि इससे उनका पारंपरिक समर्थन आधार प्रभावित हुआ। अब वही प्रक्रिया उत्तर प्रदेश में तेजी से लागू हो रही है और इससे सपा के भीतर खलबली मचना स्वाभाविक माना जा रहा है। राजनीतिक पंडित बताते हैं कि जिस ‘कोर वोट बैंक’ पर सपा भरोसा करती है, उसमें से बड़ी संख्या एसआईआर में दोहराव या गलत प्रविष्टियों में आ सकती है, और यही अखिलेश यादव के हमलों की असली वजह है।
2027 की चुनौती सपा के सामने, एसआईआर को ‘साजिश’ बताकर बचाव की कोशिश?
अखिलेश यादव पहले ही कह चुके हैं कि एसआईआर “देशवासियों के खिलाफ साजिश” है। लेकिन उनके विरोध के अंदाज़ से साफ है कि उन्हें 2027 विधानसभा चुनाव में भारी नुकसान का डर सता रहा है। बिहार में मतदाता सूची साफ होने के बाद विपक्ष की स्थिति कमजोर दिखी। अगर यही मॉडल यूपी में लागू हुआ तो सपा को भारी झटका लग सकता है।
यह भी सवाल है कि क्या एसआईआर प्रक्रिया को मुद्दा बनाकर अखिलेश यादव एक बार फिर अपने पारंपरिक ‘पीड़ित कार्ड’ की राजनीति खेलने की कोशिश कर रहे हैं? क्या वह अपने वोटरों में आशंका पैदा करके खुद को मजबूत दिखाना चाहते हैं?
चुनाव आयोग का उद्देश्य हमेशा से मतदाता सूची को सटीक रखना रहा है। यदि लंबे समय से फर्जी, मृतक या दोहरे नाम शामिल रहे हैं, तो एसआईआर जैसे सुधार आवश्यक हैं। लेकिन इन सुधारों से जिस दल को नुकसान की आशंका होती है, उसके द्वारा विरोध करना स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश भी अब इसी दौर में प्रवेश कर चुका है।
अब चर्चा इस पर नहीं कि एसआईआर सही है या गलत—बल्कि इस पर कि कौन इससे सबसे ज़्यादा डरा हुआ है
अखिलेश यादव के आरोपों पर सरकार ने भी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि एसआईआर एक नियमित प्रक्रिया है, इसका उद्देश्य लोकतांत्रिक सुधार है। लेकिन सपा लगातार इसे ‘साजिश’ बताकर 2027 के खतरे से खुद को बचाने की कोशिश कर रही है। बिहार का अनुभव सपा को डरा रहा है, और यही डर अब अखिलेश की हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंसों में साफ दिखाई दे रहा है।

