भारत-रूस दोस्ती के नए इतिहास पर दुनिया की नज़र

पुतिन को मिलेगा मोदी का ‘रिटर्न गिफ्ट’!

 भारत-रूस दोस्ती के नए इतिहास पर दुनिया की नज़र

4–5 दिसंबर की मोदी-पुतिन शिखर वार्ता से हिलेगा भू-राजनीति का पूरा लैंडस्केप

नई दिल्ली, 29 नवम्बर,(एजेंसियां)। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आ रहे हैं—और यह केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब रूस यूक्रेन युद्ध के बीच पश्चिमी दबाव झेल रहा है और भारत खुले तौर पर अपनी सामरिक स्वतंत्रता और वैश्विक संतुलनकारी भूमिका से पूरी दुनिया को चौंका रहा है। पुतिन न खाली हाथ भारत आ रहे हैं और न ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें खाली हाथ लौटाने वाले हैं। यह मुलाकात 21वीं सदी की सबसे प्रभावशाली मित्रताओं में से एक—भारत-रूस साझेदारी—को एक नए शिखर पर ले जाने वाली है।

4 और 5 दिसंबर को होने वाली भारत-रूस वार्षिक (23वीं) शिखर बैठक को लेकर वैश्विक ताकतों में बेचैनी है। अमेरिका पहले ही रूस से तेल खरीद पर भारत को दबाव में लाने की कोशिश कर चुका है, लेकिन मोदी सरकार अपने राष्ट्रीय हित पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं। ऐसे में पुतिन की यह यात्रा सिर्फ औपचारिक नहीं बल्कि बहुआयामी रणनीतिक संदेश है—भारत और रूस दोनों यह दिखाने जा रहे हैं कि उनकी दोस्ती न दबाव में आती है, न परिस्थितियों में टूटती है।

रूस ‘तोहफे’ लेकर आएगा, भारत ‘रिटर्न गिफ्ट’ देकर दुनिया को चौंकाएगा

सूत्रों ने पहले ही संकेत दे दिया है कि इस बार दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में बड़े सौदे ‘लॉक’ होंगे। यह साफ संकेत है कि मोदी सरकार पश्चिमी पाबंदियों या दबाव से प्रभावित नहीं। खास चर्चा S-400 और S-500 जैसे दुनिया के सबसे आधुनिक एयर-डिफेंस सिस्टम पर है। भारत पहले से ही S-400 की पाँच रेजिमेंट खरीद चुका है, लेकिन अब बातचीत इससे आगे बढ़ने वाली है।

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार भारत अतिरिक्त S-400 की खरीद या दुनिया के सबसे उन्नत रूसी एयर-डिफेंस सिस्टम S-500 की संभावित प्रथम उपलब्धता पर बातचीत कर सकता है। यह उस दिशा में संकेत है जहां भारत ने पहले कभी कदम नहीं रखा था। अगर ऐसा हुआ तो यह चीन-पाकिस्तान दोनों के लिए सीधा संदेश है—भारत की रक्षा लाइन अब अजेय होने जा रही है।

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पुतिन का ‘तोहफा’ संभवतः रूसी तकनीक पर आधारित नए संयुक्त प्रोजेक्ट, रूस में भारतीय उत्पादन इकाइयों के विस्तार, ऊर्जा सहयोग की नई डील और रक्षा तकनीक ट्रांसफर से जुड़ा हो सकता है। बदले में मोदी सरकार का ‘रिटर्न गिफ्ट’ इतना प्रभावशाली होगा कि पश्चिम की रातों की नींद उड़नी तय है।

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तेल, ऊर्जा और भू-राजनीति—अमेरिका की चिंता यहीं से शुरू होती है

रूस से सस्ता तेल खरीदने के बावजूद भारत पर कोई प्रतिबंध नहीं लग सका। पुतिन के इस दौरे में ऊर्जा सुरक्षा और लॉन्ग-टर्म ऑयल-गैस कॉन्ट्रैक्ट पर भी अहम बातचीत होगी। भारत रूस से कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार बन चुका है। पश्चिम के लिए यह चिंता की बात है कि रूस भारत को ऊर्जा बाजार में प्राथमिकता देता है और भारत रूस को राजनीतिक ढाल प्रदान करता है।

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भारत-रूस व्यापार अब डॉलर को किनारे करके स्थानीय मुद्राओं में होने लगा है। यह ट्रेंड अंतरराष्ट्रीय वित्तीय शक्ति संतुलन के लिए बड़ा झटका है। पुतिन-मोदी की मुलाकात इस ‘डॉलर-फ्री कॉरिडोर’ को और मजबूत कर सकती है।

रक्षा साझेदारी में नई छलांग—चीन बुरी तरह परेशान

पुतिन की यात्रा से पहले रूस ने भारत के साथ सैन्य लॉजिस्टिक्स समझौते को मंजूरी दी। इसका मतलब है कि अब दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के बेस, पोर्ट और सुविधाओं का उपयोग कर सकेंगी। यह कदम केवल भारत-रूस सहयोग ही नहीं बल्कि चीन को स्पष्ट चेतावनी है कि भारत अब दुनिया की किसी भी शक्ति के बराबर रणनीतिक क्रियाशीलता हासिल कर रहा है।

मोदी-पुतिन मुलाकात में रक्षा सचिव ने पहले ही संकेत दिया है कि S-400 की देरी वाली डिलीवरी, संयुक्त इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स और नई क्षमता वृद्धि पर ठोस परिणाम आ सकते हैं। यह बैठक सिर्फ औपचारिक नहीं—यह उन मुद्दों को क्लियर करेगी जो पिछले दो वर्षों में युद्ध और वैश्विक तनाव के कारण अटके हुए थे।

23वीं भारत-रूस शिखर वार्ता—विश्व व्यवस्था के लिए निर्णायक मोड़

यह बात अब स्पष्ट हो चुकी है कि भारत-रूस शिखर सम्मेलन एक कूटनीतिक आयोजन नहीं बल्कि रणनीतिक भू-राजनीतिक मोड़ है। दुनिया में नए ध्रुव बन रहे हैं और भारत-रूस धुरी एक बार फिर मजबूत हो रही है। मोदी और पुतिन की निजी केमिस्ट्री इस रिश्ते को ऐसा भरोसा देती है जो आज किसी दूसरी वैश्विक जोड़ी में देखने को नहीं मिलता।

पश्चिमी विश्लेषक पहले ही लिख चुके हैं—भारत रूस को नहीं छोड़ेगा और रूस भारत को। यही कारण है कि पुतिन ने युद्ध के बीच भारत को प्राथमिकता दी, और भारत ने पश्चिम के शोर-शराबे के बावजूद रूस से व्यापार, रक्षा और ऊर्जा सहयोग बढ़ाया।

यह यात्रा बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका को निर्णायक रूप से आगे बढ़ाने वाली है। और इस बार ‘रिटर्न गिफ्ट’ इतना बड़ा होगा कि दुनिया उसे नज़रअंदाज़ नहीं कर पाएगी।