दंतेवाड़ा में नक्सलियों का बड़ा आत्मसमर्पण: 65 लाख के इनामी 37 माओवादी मुख्यधारा में लौटे
बस्तर पुलिस की ‘पूना मारगेम’ पहल बनी बदलाव की मिसाल
नई दिल्ली, 29 नवम्बर,(एजेंसियां)। छत्तीसगढ़ के उग्रवाद प्रभावित दंतेवाड़ा जिले में रविवार का दिन सुरक्षा बलों और स्थानीय प्रशासन के लिए एक बड़ी उपलब्धि लेकर आया, जब कुल 37 नक्सलियों ने हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। इनमें 12 महिला नक्सली भी शामिल हैं। आत्मसमर्पण करने वालों में 27 माओवादी ऐसे हैं जिन पर कुल मिलाकर 65 लाख रुपये का इनाम घोषित था। इस सामूहिक आत्मसमर्पण को न केवल सुरक्षा अभियानों की सफलता माना जा रहा है, बल्कि यह राज्य सरकार की पुनर्वास नीतियों और बस्तर पुलिस द्वारा चलाए जा रहे ‘पूना मारगेम’ यानी ‘नया रास्ता’ अभियान की प्रभावी पहल को भी दर्शाता है।
बस्तर रेंज के पुलिस अधिकारियों ने बताया कि लंबे समय से चल रहे सर्च ऑपरेशन, मुठभेड़ों में लगातार दबाव और सामाजिक-आर्थिक बदलाव के प्रयासों ने नक्सलियों को मुख्यधारा में आने के लिए प्रेरित किया है। दंतेवाड़ा में हुए इस आत्मसमर्पण कार्यक्रम में पुलिस अधिकारियों और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में माओवादियों ने हथियार डालकर लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास जताया।
दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक गौरव राय ने बताया कि नक्सलियों के बड़े समूह का आत्मसमर्पण दिखाता है कि माओवादी संगठन अब कमजोर पड़ रहे हैं और जंगल में सक्रिय दलों में भारी भ्रम और असंतोष व्याप्त है। लंबे समय से चल रही पुलिस की रणनीतिक कार्रवाइयों—जैसे सटीक इंटेलिजेंस, सघन कॉम्बिंग, स्थानीय लोगों से सहयोग और विकास कार्यों की पहुँच—ने नक्सलियों को घुटनों पर ला दिया है।
‘पूना मारगेम’ अभियान बस्तर रेंज पुलिस की वह पहल है जिसका उद्देश्य नक्सलवाद का रास्ता छोड़ चुके युवाओं को सम्मानजनक जीवन दिलाना, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है। यह कार्यक्रम उन्हें न केवल पुनर्वास देता है, बल्कि समाज में गरिमापूर्ण जीवन जीने की राह भी खोलता है। इसका प्रभाव पिछले कुछ वर्षों में लगातार देखा जा रहा है। आत्मसमर्पण कर चुके कई युवा अपने गांवों में वापस जाकर खेती-बाड़ी, स्वरोजगार, निर्माण कार्य और सरकारी योजनाओं के लाभ के माध्यम से पूरी तरह सामान्य जीवन जी रहे हैं।
पुलिस अधीक्षक गौरव राय के अनुसार, पिछले 20 महीनों में बस्तर रेंज में कुल 508 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, जो क्षेत्र में नक्सलवाद के तेजी से कमजोर होते प्रभाव का स्पष्ट संकेत है। यह आत्मसमर्पण सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि उन परिवारों की जिंदगी में लौटे उजाले का प्रतीक है जो वर्षों तक हिंसा, भय और संगठन की कठोरता के बीच पिसते रहे। राय के अनुसार, जिन नक्सलियों ने हथियार छोड़े हैं, उनमें कई वर्षों से सक्रिय कैडर शामिल हैं, जो बड़े माओवादी दलों की रणनीति तैयार करने, ग्रामीणों को धमकाने और पुलिस दलों पर हमले करने में शामिल रहे थे।
आत्मसमर्पण करने वालों में कई ऐसे नाम भी शामिल हैं जिन्हें सुरक्षा एजेंसियाँ लंबे समय से तलाश रही थीं। इन पर न केवल कई गंभीर मामलों में आरोप थे, बल्कि इनकी गिरफ्तारी या आत्मसमर्पण नक्सली नेटवर्क के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। स्थानीय गांवों के साथ किए गए संवाद, विकास कार्यों की पहुँच बढ़ाना, वनाधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन और ग्रामीणों को सुरक्षा का भरोसा देने ने इस प्रक्रिया को गति दी है।
स्थानीय स्तर पर यह भी देखा गया है कि गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं, स्कूलों, सड़कों और मोबाइल नेटवर्क की उपलब्धता बढ़ने से युवाओं में नक्सली विचारधारा के प्रति आकर्षण कम हुआ है। वहीं, नक्सली संगठन में लगातार बढ़ते अविश्वास, फंड की कमी, वरिष्ठ कमांडरों द्वारा उत्पीड़न और हिंसक तरीकों को लेकर असंतोष भी आत्मसमर्पण का एक बड़ा कारण है। पुलिस का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में माओवादी संगठनों में खाद्यान्न की कमी, जंगल में लगातार दबाव और सुरक्षित ठिकानों की कमी भी उनके कमजोर होने की वजह बनी है।
राज्य सरकार ने आत्मसमर्पण करने वालों को पुनर्वास नीति के तहत आर्थिक सहायता, कौशल विकास, सुरक्षा और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की है। इन्हें शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य सेवाएँ और स्वरोजगार योजनाओं में प्राथमिकता दी जाती है। नक्सलियों के बच्चों को स्कूलों में प्रवेश दिलाने और महिलाओं को स्व-सहायता समूहों से जोड़ने के प्रयास भी तेजी से चल रहे हैं।
‘पूना मारगेम’ का अर्थ स्थानीय गोंडी बोली में ‘नया रास्ता’ होता है। यह पहल माओवादी हिंसा से त्रस्त बस्तर क्षेत्र में विश्वास बहाली का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है। इस अभियान के तहत नक्सलवाद छोड़ने वालों को सिर्फ हथियार डालने तक सीमित नहीं रखा जाता, बल्कि जीवन की नई शुरुआत के लिए हर कदम पर सहयोग दिया जाता है। अधिकारियों के अनुसार, यह न सिर्फ सुरक्षा रणनीति का हिस्सा है, बल्कि एक सामाजिक सुधार अभियान भी है जिसने क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सकारात्मक बदलाव लाए हैं।
दंतेवाड़ा में 37 नक्सलियों का आत्मसमर्पण आने वाले महीनों में और बड़े समूहों के मुख्यधारा में लौटने का संकेत देता है। यह घटना स्पष्ट करती है कि उग्रवाद अब अपने पुराने प्रभाव को बनाए रखने में नाकाम हो रहा है और सरकार की ‘विकास एवं सुरक्षा’ की दोहरी रणनीति फल देने लगी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही रफ्तार जारी रही तो अगले कुछ वर्षों में बस्तर की तस्वीर न केवल शांतिपूर्ण बल्कि विकासशील क्षेत्र के रूप में उभर सकती है।

