सीमावर्ती इलाकों में जनसंख्या का भारी असंतुलन
यूपी, बिहार, बंगाल, असम और नेपाल तक बढ़ी मुस्लिम आबादी
विदेशी फंडिंग, धर्मांतरण और घुसपैठ से गृह मंत्रालय चिंतित
बांग्लादेशियों और रोहिंग्या मुस्लिमों की घुसपैठ से दशा खराब
नई दिल्ली, 30 अगस्त (एजेंसियां)। देश के कई सीमावर्ती इलाकों खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, असम और नेपाल से सटे जिलों में जनसंख्या के भारी असंतुलन को लेकर केंद्र सरकार ने गहरी चिंता जताई है। यूपी के तीन जिलों श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर में बीते 10 वर्षों में मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या दोगुनी हो चुकी है। हाल ही में यूपी के संभल और असम के 11 जिलों में हुई जांच और सर्वेक्षण से सामने आया है कि इन इलाकों में हिंदू आबादी तेजी से घट रही है, जबकि मुस्लिम समुदाय की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, यूपी के तीन सबसे संवेदनशील जिले श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर में बीते 10 वर्षों में मुस्लिम जनसंख्या दोगुनी हो चुकी है। सुरक्षा एजेंसियों ने इन इलाकों में विदेशी फंडिंग, जाली नोटों की तस्करी और अवैध धर्मांतरण जैसे गंभीर मामले पकड़े हैं। इन गतिविधियों में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की भूमिका भी शामिल है। यह केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं है। असम में स्थिति और भी गंभीर है। यहां के कम से कम 11 जिलों में हिंदू अब अल्पसंख्यक हो चुके हैं। इसकी वजह बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ, बांग्लादेशी घुसपैठियों की ज्यादा जन्म दर और संगठित अतिक्रमण है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा का कहना है कि अगर यही रफ्तार बनी रही तो 2041 तक राज्य में हिंदू और मुस्लिम आबादी 50-50 हो सकती है।
ये आंकड़े केवल जनसंख्या बदलाव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक संतुलन और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए खतरे का सबब हैं। गृह मंत्रालय ने संबंधित जिलों के अधिकारियों को सख्त निगरानी और कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। नेपाल बॉर्डर पर भी यही पैटर्न देखा जा रहा है, जहां हिंदू जनसंख्या घट रही है, जबकि मुस्लिम समुदाय की आबादी में बढ़ोतरी हो रही है। संभल जिले से आई एक उच्चस्तरीय कमेटी रिपोर्ट ने जनसंख्या के बदलाव को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, आजादी के समय संभल नगर पालिका क्षेत्र में हिंदुओं की आबादी करीब 45 फीसदी थी, लेकिन अब यह घटकर सिर्फ 15 फीसदी रह गई है। यह बदलाव महज आंकड़ों का उतार-चढ़ाव नहीं माना जा रहा, बल्कि रिपोर्ट में इसे एक सुनियोजित साजिश और नस्लीय-सफाया यानि एथनिक-क्लींजिंग जैसा गंभीर मामला बताया गया है। इसमें न सिर्फ जनसंख्या का संतुलन बदला गया है, बल्कि मंदिरों और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने के भी प्रमाण मिले हैं, जिससे साफ है कि यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से हुआ है।
यही स्थिति अब उत्तर प्रदेश के नेपाल सीमा से सटे संवेदनशील जिलों श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर में भी सामने आ रही है। पिछले कुछ वर्षों में इन इलाकों में जनसंख्या का संतुलन तेजी से बदला है। यहां अवैध रूप से धार्मिक स्थलों का निर्माण बढ़ा है और सीमावर्ती क्षेत्रों में तेजी से अतिक्रमण किया जा रहा है। स्थानीय लोग पलायन को मजबूर हो रहे हैं, जबकि बाहरी लोग बड़ी संख्या में यहां आकर बसते जा रहे हैं। इसी के साथ इन क्षेत्रों में मानव तस्करी, अवैध धर्मांतरण और आपराधिक गतिविधियों में भी बढ़ोतरी देखी जा रही है, जिससे यह इलाका सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बन गया है।
बिहार और पश्चिम बंगाल की स्थिति तो और भी जघन्य है। बिहार में बांग्लादेशियों और रोहिंग्या घुसपैठियों को तो सारी सरकारी सुविधाएं मुहैया कराई जाती रहीं और उन्हें वोट बैंक बनाने का खेल चलता रहा। तमाम राजनीतिक दबाव के बावजूद बिहार में 65 लाख अतिरिक्त मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से बाहर हुए। मतदाता पुनरीक्षण प्रक्रिया (एसआईआर) के दरम्यान ही यह उजागर हुआ कि किस तरह बड़ी तादाद में बाहरी लोगों और घुसपैठियों को वोटर बनाया गया। इससे ही जनसंख्या के बदलाव और असंतुलन के बारे में समझा जा सकता है। बिहार में मुस्लिम आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार 16.87 प्रतिशत थी, जो 2023 के जाति-आधारित जनगणना में बढ़कर लगभग 17.7 प्रतिशत हो गई, और पिछले कई दशकों से लगभग हर जनगणना के साथ इसमें वृद्धि दर्ज की गई है। यह वृद्धि जनसांख्यिकीय कारकों के कारण हुई है। बिहार में मुस्लिम बहुल जिले किशनगंज, अररिया और पूर्णिया हैं। ये जिले बांग्लादेश की सीमा से सटे हुए हैं और यहां बांग्लादेशियों और रोहिंग्या मुसलमानों की घुसपैठ व्यापक पैमाने पर हुई है और उन्हें राजनीतिक दलों ने बसाने का काम किया।
पश्चिम बंगाल की स्थिति भयानक है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति ने पश्चिम बंगाल को बांग्लादेश बना कर रख दिया है। यहां बांग्लादेशियों और रोहिंग्या मुसलमानों की खुली एंट्री से जनसंख्या में भारी असंतुलन पैदा हो गया है। बंगाल और बांग्लादेश सिर्फ एक जैसा नाम ही नहीं हैं बल्कि ममता बनर्जी की कृपा से अब बांग्लादेश की रूह खुले बॉर्डर से धीरे-धीरे इस पार घुस आई है। यह सिर्फ मुस्लिम आबादी बढ़ने की बात नहीं है, बल्कि उस विदेशी तत्व की बात है जो इस बढ़ोतरी में शामिल है और जो चिकन-नेक का गला घोंट रहे हैं। 1951 में पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी 20 प्रतिशत थी। 2011 में यह 27 प्रतिशत पहुंच गई। इसके बाद कोई जनगणना नहीं हुई, लेकिन आकलन है कि आज मुस्लिम आबादी का आंकड़ा 30 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गया है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, बांग्लादेश से आए 10 लाख से ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थी भी हैं और इन्हें राजनीतिक वजहों से भारतीयों के साथ घुला-मिला दिया गया हैं। इनके पास आधार कार्ड हैं, वोटर आईडी है, यानि अब ये लोग परोक्ष रूप से भारत के नागरिक बन चुके हैं।
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में वर्ष 1951 में मुसलमान 55 प्रतिशत थे और हिंदू 45 प्रतिशत थे। 2011 आते-आते यहां मुसलमान 66 प्रतिशत हो गए और हिंदू घटकर 33 प्रतिशत रह गए। मालदा जिले में 1951 में मुस्लिम आबादी 37 प्रतिशत थी और हिंदू 62 प्रतिशत थे। लेकिन 2011 में मुस्लिम 51.27 प्रतिशत हो गए और हिंदू 48 प्रतिशत रह गए। इसी तरह उत्तर दिनाजपुर में 1951 में मुस्लिम आबादी 39 प्रतिशत और हिंदू आबादी 60 प्रतिशत थी। लेकिन 2011 में मुस्लिम आबादी 49.92 प्रतिशत पर पहुंच गई और हिंदू भी लगभग 49 प्रतिशत के साथ बराबरी पर रहे। उत्तर 24 परगना में 1951 में मुस्लिम आबादी 19 प्रतिशत और हिंदू 80 प्रतिशत थी। लेकिन 2011 आते-आते मुसलमान 25.82 प्रतिशत और हिंदू 73.46 प्रतिशत रह गए। दक्षिण 24 परगना में 1951 में मुस्लिम आबादी करीब 20 प्रतिशत थी, जो 2011 आते-आते ये बढ़कर 35.57 प्रतिशत हो गई। बीरभूम में 1951 में मुसलमान 22 प्रतिशत और हिंदू 77 प्रतिशत थे। वर्ष 2011 में मुस्लिम 37.06 प्रतिशत हो गए और हिंदू घटकर 62.29 प्रतिशत रह गए। आबादी का यह असंतुलन घुसपैठ से नहीं बढ़ा, तो फिर कैसे बढ़ा?
असम में जनसंख्या के स्वरूप में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है, जिसे लेकर राज्य और केंद्र सरकार दोनों ही चिंतित हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक, उस समय असम के 9 जिले मुस्लिम बहुल थे, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर कम से कम 11 हो गई है। इस बदलाव के पीछे क्या कारण हैं, इसे लेकर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने साफ तौर पर बांग्लादेशी घुसपैठ, मुस्लिम समुदाय की ऊंची जन्म दर और जमीन पर अवैध कब्जों को जिम्मेदार ठहराया है। असम के मुख्यमंत्री सरमा का मानना है कि अगर यही प्रवृत्ति बनी रही तो 2041 तक राज्य में हिंदू और मुस्लिम आबादी का अनुपात बराबरी पर आ सकता है। उन्होंने इस बदलाव को केवल जनसंख्या का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संतुलन से जुड़ा एक गंभीर विषय बताया है। असम जैसे सीमावर्ती और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील राज्य के लिए यह बदलाव कई तरह की चुनौतियां खड़ी कर सकता है।
जांच में सामने आया है कि सीमावर्ती इलाकों में हो रहे जनसांख्यिकीय और धार्मिक बदलावों के पीछे विदेशी फंडिंग की बड़ी भूमिका है। खासकर यूपी के बलरामपुर में अवैध धर्मांतरण के आरोपी छांगुर पीर का मामला इस साजिश की गहराई को उजागर करता है। छांगुर पीर ने नेपाल के बैंक खातों के जरिए विदेश से बड़ी मात्रा में पैसा मंगवाया और उसका इस्तेमाल सुनियोजित तरीके से धर्मांतरण के लिए किया। जांच में यह भी पाया गया कि क्षेत्र में ईसाई मिशनरियां सक्रिय रूप से दलित और गरीब परिवारों को निशाना बनाकर उनका धर्मांतरण करा रही थीं। इन घटनाओं के बीच एक और गंभीर मामला तब सामने आया जब पाकिस्तान को 100 करोड़ की टेरर फंडिंग का सुराग मिला।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीमावर्ती इलाकों में हो रहे जनसांख्यिकीय बदलाव और अवैध धार्मिक गतिविधियों के मामलों को बेहद गंभीरता से लिया है। अक्टूबर 2024 में ही नेपाल सीमा से सटे इलाकों में अवैध मदरसों के निर्माण, घुसपैठ की साजिश और मजहबी शिक्षा की आड़ में देशविरोधी गतिविधियों का आधिकारिक खुलासा हुआ था। गृह मंत्रालय ने इस आधार पर उत्तर प्रदेश के सभी सीमावर्ती जिलों के डीएम और एसपी को सख्त कार्रवाई के निर्देश जारी किए। बलरामपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी अरविंद सिंह ने भी 2024 में इस पूरे नेटवर्क और विदेशी फंडिंग के संबंध में शासन को एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट भेजी थी। इस रिपोर्ट में उन्होंने कुछ स्थानीय पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए थे। लेकिन अफसोस की बात यह है कि उस वक्त उनकी रिपोर्ट दबा दी गई और उन्हें जिले से हटा दिया गया। अब जबकि केंद्र सरकार इस मामले को प्राथमिकता दे रही है, उसी रिपोर्ट को फिर से खंगालकर नए सिरे से जांच शुरू कर दी गई है।
इस पूरे मुद्दे की गंभीरता सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। नेपाल में भी 2021 की जनगणना में हिंदू आबादी में गिरावट दर्ज की गई है, जबकि मुस्लिम और ईसाई आबादी में बढ़ोतरी देखी गई है। चूंकि इन दोनों देशों की सीमाएं खुली हैं और सामाजिक व धार्मिक गतिविधियां आपस में जुड़ी हुई हैं, इसलिए भारत सरकार ने नेपाल से भी सहयोग मांगा है ताकि सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थिरता बनाए रखी जा सके और अवैध गतिविधियों पर कड़ा अंकुश लगाया जा सके।