सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों के डर से जर्मनी भागे!
केरल सरकार के स्कूली हैंडबुक में भूल या षडयंत्र?
तिरुवनंतपुरम, 17 अगस्त (एजेंसियां)। केरल राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) की कक्षा चार की किताब में लिखा गया है कि सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों के डर से जर्मनी भाग गए थे। केरल सरकार के इस पाठ्यपुस्तक से विवाद काफी बढ़ गया। कहा जा रहा है कि यह तथ्यात्मक गलती नहीं, बल्कि भारत के महानतम स्वतंत्रता सेनानियों में से एक के योगदान को जानबूझकर विकृत करने का षडयंत्र है।
इतिहासकारों का कहना है कि सुभाष चंद्र बोस ने भारत की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया, उनके बारे में यह कहना कि वे डर से भाग गए, उनकी वीरता का अपमान है। सुभाषचंद्र बोस डर से नहीं, बल्कि अंग्रेजों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने और एक सैन्य मोर्चा बनाने के दृढ़ संकल्प के साथ भारत से बाहर गए थे। उनकी आजाद हिंद फौज ब्रिटिश शासन के लिए एक बड़ी चुनौती थी और नेताजी की यह फौज आज भी लोगों को प्रेरित करती है। हालांकि, खबर है कि एससीईआरटी ने अपनी गलती स्वीकार कर ली है और अगले संस्करण में सुधार का वादा किया है। लेकिन केवल एक माफी और भविष्य में सावधानी का वादा काफी नहीं है। केरल और पूरे देश के लोगों को यह जानने का अधिकार है कि ऐसी गंभीर गलती हुई ही क्यों? और इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई की जाएगी?
सुभाष चंद्र बोस सिर्फ एक किताब का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि एक स्थायी राष्ट्रीय नायक हैं। केरल सरकार को इस बात का जवाब देना होगा कि किताब का यह अध्याय एक चूक थी या जानबूझकर किया गया प्रयास? महान स्वतंत्रता सेनानी के प्रति इस तरह के शब्द और तथ्यों से छेड़छाड़ को त्रुटि या चूक कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। पाठ्यपुस्तक तैयार करते समय सावधानी बरती जाती है। इन्हें कई स्तरों पर जांचा जाता है। लोगों का कहना है कि सीपीआई-एम के नेतृत्व वाली केरल सरकार और उसकी एजेंसियां का यह एक प्रयोग लगता है। उन्होंने यह टटोलने की कोशिश की है कि इस तरह के ऐतिहासिक विकृतियों पर समाज कैसे प्रतिक्रिया देता है।
जानकारों का कहना है कि वामपंथियों का नेताजी के प्रति दुराग्रह नया नहीं है। वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लिए अपमानजक कार्टून अपने मुखपत्रों में छापते थे। 1940 में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी पुस्तिका बेनकाब दल व राजनीति में नेताजी को अंधा मसीहा कहा गया। फिर उनके कामों को कहा गया, सिद्धांतहीन अवसरवाद, जिसकी मिसाल मिलनी कठिन है। धीरे-धीरे नेताजी के प्रति कम्युनिस्ट शब्दावली हिंसक और गाली-गलौज से भरती गई। जैसे, काला गिरोह, गद्दार बोस, दुश्मन के जरखरीद एजेंट, तोजो (जापानी तानाशाह) और हिटलर के अगुआ दस्ते, राजनीतिक कीड़े, सड़ा हुआ अंग जिसे काटकर फेंकना है,आदि। ये सब विशेषण सुभाष बोस और उनकी सेना आई़ एऩ ए़ (इंडियन नेशनल आर्मी) के लिए थे। तब कम्युनिस्ट मुखपत्रों, पत्रिकाओं में नेताजी के कई कार्टून छपे थे, जिससे कम्युनिस्टों की घोर अंधविश्वासी मानसिकता की झलक मिलती है (उन पर सधी नजर रखने वाले इतिहासकार स्व़ सीताराम गोयल के सौजन्य से वे कार्टून उपलब्ध हैं)। अधिकांश कार्टूनों में सुभाष बाबू को जापानी, जर्मन फासिस्टों का कुत्ते या बिल्ली जैसा दिखाया गया है, जिससे उसका मालिक जैसे चाहे खेलता है। एक कार्टून में बोस को तोजो का मुखौटा, तो अन्य में भारतवासियों पर जापानी बम गिराने वाला दिखाया गया है।
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