हिंदू मंदिरों का धन धार्मिक उद्देश्यों पर ही खर्च हो
मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को दी हिदायत
चेन्नई, 30 अगस्त (एजेंसियां)। हिंदू मंदिरों का धन दूसरे कामों में खर्च किए जाने के तौर-तरीके पर मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को फटकार लगाई है और सख्त निर्देश दिया है कि मंदिरों का धन मंदिरों के विकास और धार्मिक उद्देश्यों पर ही खर्च किया जाए। तमिलनाडु की एमके स्टालिन सरकार हिंदू मंदिरों के पैसे से शादी घर और अन्य ऐसे ही कामों पर खर्च कर रही थी। मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को रद्द करते हुए कहा, सिर्फ धार्मिक उद्देश्यों के लिए मंदिर के धन का इस्तेमाल हो। तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश तर्क पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह भले ही एक संस्कार है लेकिन वह करारनुमा शर्तों से बंधा होता है। इसलिए इसे धार्मिक उद्देश्य नहीं माना जा सकता है।
इस तरह मद्रास हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मंदिर का धन केवल धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए ही इस्तेमाल हो सकता है। इसका इस्तेमाल किसी व्यावसायिक काम के लिए नहीं किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने तमिलनाडु की एमके स्टालिन सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत पांच हिंदू मंदिरों के धन का इस्तेमाल विवाह के लिए हॉल बनाने में किया जाना था। हाईकोर्ट ने सरकार को चेतावनी दी कि मंदिर की निधि भक्तों और दानदाताओं की आस्था से जुड़ी है, इसे किसी अन्य उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करना उनके अधिकारों का उल्लंघन है।
जस्टिस एसएम सुब्रमण्यम और जस्टिस जी अरुल मुरुगन की पीठ ने यह निर्णय सुनाते हुए कहा कि राज्य सरकार का यह आदेश हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम 1959 और उसके नियमों के खिलाफ है। हाईकोर्ट ने साफ किया कि अधिनियम की धारा 66 के अनुसार मंदिर की बची हुई धनराशि को न तो किसी व्यावसायिक गतिविधि में और न ही लाभ कमाने वाली योजनाओं में लगाया जा सकता है। इसका इस्तेमाल केवल धार्मिक कार्यक्रमों, मंदिरों के रखरखाव और भक्तों की सुविधाओं के लिए ही होना चाहिए। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि मंदिर के धन का उपयोग इस तरह से करना कानून का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी बताया कि विवाह हॉल बनाने के लिए न तो कोई भवन योजना ली गई थी और न ही नियमों के तहत आवश्यक प्रक्रिया पूरी की गई थी, इसके बावजूद धनराशि जारी कर दी गई।
दूसरी ओर सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि हिंदू विवाह धार्मिक गतिविधि है और इस तरह के विवाह हॉल गरीब परिवारों को कम खर्च में विवाह करने की सुविधा देंगे। हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने सरकारी आदेश की समीक्षा करते हुए पाया कि बनाए जा रहे विवाह हॉल मुफ्त में उपलब्ध नहीं थे बल्कि किराए पर दिए जा रहे थे। यानि, यह एक व्यावसायिक गतिविधि थी, न कि कोई दान या धार्मिक सेवा। हाईकोर्ट ने कहा कि मंदिर निधि का उद्देश्य केवल मंदिर और उससे जुड़े धार्मिक कार्यों तक सीमित है। इस धन का उपयोग भक्तों की आस्था से खिलवाड़ किए बिना होना चाहिए। फैसले में हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि मंदिरों में जमा धन, आभूषण और अचल सम्पत्तियां भक्तों और दानदाताओं की ओर से भगवान को अर्पित की जाती हैं। यह सार्वजनिक या सरकारी धन नहीं है, जिसे राज्य अपनी सुविधा से कहीं भी खर्च कर दे।
सरकार की भूमिका केवल मंदिर निधि और सम्पत्तियों के दुरुपयोग को रोकने की है, न कि उन्हें किसी नए काम में लगाने की। अंत में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए आदेश को रद्द कर दिया कि राज्य ने न तो नियमों का पालन किया और न ही भवन निर्माण की अनुमति ली। यदि मंदिर निधि का इस तरह इस्तेमाल किया गया तो यह भक्तों के धार्मिक अधिकारों का हनन होगा और मंदिर की पवित्रता पर आघात करेगा। हाईकोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि मंदिर का धन सिर्फ मंदिर और धार्मिक गतिविधियों के लिए ही है, किसी और उद्देश्य के लिए नहीं।