आत्मनिर्भर भारत बनने के लिए डिजिटल गुलामी से मुक्ति जरूरी

डिजिटल-विश्व में जिसका वर्चस्व होगा, वही दुनिया पर राज करेगा

 आत्मनिर्भर भारत बनने के लिए डिजिटल गुलामी से मुक्ति जरूरी

डॉ. मोतीलाल गुप्ता आदित्य

जबसे मोदी सरकार द्वारा आत्मनिर्भर भारत का अभियान चलाया गया हैभारत में न केवल उद्योग क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बल्कि रक्षा के क्षेत्र में भी लगातार आत्मनिर्भरता की तरफ लंबे कदम बढ़ाए गए हैं। जिन क्षेत्रों में भारत अभी तक प्रौद्योगिकी क्षेत्र के लिए विकसित देशों पर निर्भर रहा हैवहां भी भारत ने प्रौद्योगिकी स्थानांतरण और मेक इन इंडिया के माध्यम से आत्मनिर्भरता की तरफ कदम बढ़ाए हैं। कल तक भारत रक्षा क्षेत्र मेंरक्षा प्रणालियोंयुद्धक विमानोंयुद्ध पोतों और प्रौद्योगिकी के लिए विकसित देशों पर निर्भर रहा हैऐसे अनेक क्षेत्रों में भी भारत स्वदेशी प्रौद्योगिकी और उपकरणों का तेजी से विकास कर रहा है। जिसके चलते भारत की अर्थव्यवस्था भी तेजी से आगे बढ़ रही है।

वर्तमान युग सूचना प्रौद्योगिकी का युग है। इस युग में जिसका डिजिटल-विश्व में वर्चस्व हैवही दुनिया पर राज कर सकता है। आत्मनिर्भर वही हो सकता है जिसके पास डिजिटल शक्ति है। इसी के चलते चीन और रूस जैसे देशों ने अपना खुद का सर्च इंजन बहुत पहले बना लिया था। रूस और चीन दोनों देशों में अपने स्वयं के सर्च इंजन हैं जो गूगल के विकल्प के रूप में काम करते हैं। रूस का सर्च इंजन: यांडेक्स है इसे 1997 में स्थापित किया गया था। यह सर्च इंजन वेब पेजइमेजन्यूज और अन्य सेवाएं प्रदान करता है। अगर बाजार हिस्सेदारी की बात करें तो रूस में यांडेक्स की बाजार हिस्सेदारी लगभग 62.6 प्रतिशत हैजबकि गूगल की हिस्सेदारी लगभग 28.3 प्रतिशत है। चीन के सर्च इंजन का नाम बाइडू है जिसकी स्थापना 2000 में की गई जो वेब पेजइमेजवीडियो और अन्य सेवाएं प्रदान करता है। चीन में बाइडू की बाजार हिस्सेदारी लगभग 66 प्रतिशत है। हालांकि रूस और चीन में गूगल का प्रयोग किया जाता है लेकिन उनकी बाजार हिस्सेदारी कम है। रूस में गूगल की हिस्सेदारी लगभग 28.3 प्रतिशत हैजबकि चीन में गूगल की हिस्सेदारी बहुत कम है क्योंकि चीन में गूगल की सेवाएं प्रतिबंधित हैं। इसके अतिरिक्त सोगोऊ  चीन में एक अन्य लोकप्रिय सर्च इंजन है जिसकी बाजार हिस्सेदारी लगभग 5 प्रतिशत है। चीन ने तो अपना स्वदेशी सर्च इंजन बनाने के साथ-साथ फेसबुक ट्विटर जैसे सभी प्लेटफार्म को चीन में प्रतिबंधित करते हुए अपने स्वदेशी प्लेटफार्म का प्रयोग प्रारंभ कर अमेरिका के गूगल और उसके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर निर्भरता समाप्त कर दी थी। 

इस प्रकार यह तय है कि डिजिटल क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने बिना हम आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र नहीं बन सकते। यहां यह कहना भी अनुचित न होगा कि भारत सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक बड़ी शक्ति होने के बावजूद इस क्षेत्र में अब तक अमेरिका जैसी महाशक्तियों के सामने बहुत पीछे है। यह कहना भी अनुचित न होगा कि भारत लगभग पूरी तरह अमेरिकन डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर निर्भर है। भारत में पिछले कई दशकों से यह बात लगातार उठती रही है कि यदि भारत को डिजिटल विश्व में आत्मनिर्भर बनना है तो हमारे पास खुद का सर्च इंजन होना चाहिए। भारत को इससे न केवल हमारी गूगल पर निर्भरता समाप्त होगी बल्कि हमारा डाटा भी हमारे पास रहेगा जिसके माध्यम से अमेरिका और उसकी कंपनियां हमारे बाज़ार परहमारे दिलों-दिमाग पर अपना नियंत्रण स्थापित करती है।

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लगभग 90 करोड़ इंटरनेट प्रयोक्ताओं के साथ भारतचीन के बाद विश्व का सबसे बड़ा इंटरनेट प्रयोक्ता है। इसके बावजूद आज भी भारत में एक सामान्य व्यक्ति के लिए इंटरनेट का अर्थ अमेरिकन कंपनियों के गूगलमाइक्रोसॉफ्टफेसबुकव्हाट्सएपइंस्टाग्रामट्विटर आदि हैं। अगर यह न हों तो सामान्य व्यक्ति के लिए इंटरनेट होना भी व्यर्थ हो जाएगा। इन प्लेटफार्म के माध्यम से अमेरिका कंपनियों के पास भारत के 140 करोड़ लोगों का डाटा पहुंचता है। जिसके माध्यम से सूचना-साम्राज्य पर अमेरिका का विश्वभर में और विशेषकर भारत पर लगभग एकाधिकार है। इस सूचना-साम्राज्य के माध्यम से अमेरिकन कंपनियां हमारी सोचहमारे विचारहमारी अभिरुचिहमारे व्यवहार और हमारे दिमागों को पढ़ती हैं। हम क्या सर्च करते हैंहम क्या संदेश भेजते हैंहम क्या सोचते हैंहम किनसे बात करते हैंहमें किस तरह के समाचार अथवा कार्यक्रम अच्छे लगते हैंहमें किन उत्पादों की आवश्यकता हैइस डाटा का विश्लेषण करते हुए अमेरिकन कंपनियां भारत में अपने बाजार का विस्तार करती हैं। इसके चलते अमेजन जैसी डिजिटल व्यापार कंपनियों का भी भारत पर तेजी से वर्चस्व बनता जा रहा है। यही नहींइन डिजिटल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से और उपलब्ध सूचनाओं का प्रयोग करते हुए अमेरिका और उसकी कंपनियों द्वारा विश्व के विभिन्न देशों में लोगों की सोच को प्रभावित करते हुए राजनीतिक और रणनीतिक प्रयोग भी किया जाता है। इस तरह डिजिटल दासता न केवल हमारी आर्थिक स्वाधीनता के लिए घातक है बल्कि हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता के लिए भी चुनौती की तरह हैं।

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आत्मनिर्भरता और डाटा की सुरक्षा के लिए भारत द्वारा भी अपना सर्च इंजन बनाने की आवश्यकता महसूस की जाती रही है। भारत की आत्मनिर्भर के लिए न केवल गूगल जैसा सर्च बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी अपने होने चाहिए। अपने कंप्यूटरों पर कार्य करने के लिए भारत के अधिकांश लोग आज भी माइक्रोसॉफ्ट पर निर्भर हैं। यदि आज माइक्रोसॉफ्ट उपलब्ध न हो तो देश का लगभग सारा कार्य बंद हो जाएगा। गूगल फेसबुक व्हाट्सएप इंस्टाग्राम आदि प्लेटफार्म का सबसे बड़ा प्रयोग करने वाला देश है। इनके द्वारा अमेरिकन कंपनियां हर वर्ष अरबों डॉलर कमाती है।

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हाल ही में अमेरिका द्वारा भारत पर टैरिफ हमला करने के बाद भारत सरकार द्वारा डिजिटल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़े कदम उठाने पर विचार कर रही है। चर्चा यह भी है कि भारत द्वारा अपना स्वयं का स्वदेशी सर्च इंजन कॉमेट लॉन्च कर दिया गया है। लेकिन वास्तव में कॉमेट का विकास परप्लेक्सिटी कंपनी द्वारा किया गया है। जिसके चार संस्थापकों में से एक संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओभारतीय मूल के अमेरिकी अर्जिनद श्रीनिवास हैं। कॉमेट  एक सर्च इंजन है जो उपयोगकर्ताओं को इंटरनेट पर जानकारी खोजने में मदद करता है। कॉमेट मूलत: एक कृत्रिम बुद्धि युक्त ब्राउजर है। कॉमेट  को एआई-ब्राउजर की शुरुआत माना जा रहा है है। जहां ब्राउजर सीधे एआई एजेंट के रूप में कार्य करता है। यह न केवल खोज उपकरण के रूप में एक मेटा सर्च इंजन हैजिसका अर्थ है कि यह अन्य सर्च इंजनों जैसे कि गूगलबिंग यह माइक्रोसॉफ्ट का सर्च इंजन हैऐसे सर्च इंजन आदि से परिणाम इकट्ठा करता है और उपयोगकर्ता को एक ही स्थान पर विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्रदान करता है। कॉमेट उपयोगकर्ता को एक ही स्थान पर विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्रदान करता है और उपयोगकर्ता के खोज जिज्ञासा के अनुसार प्रासंगिक परिणाम प्रदान करता है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार मातृभाषा और भारतीय भाषाओं को आगे बढ़ाने की और उनके माध्यम से ज्ञानार्जन की बात करते रहे हैं। सर्च इंजन कॉमेट भारत की जनता की मातृभाषा की शक्ति से लैस है। बताया जा रहा है कि यह अंग्रेजी के अतिरिक्त भारत की 22 से अधिक भाषाओं में कार्य करेगा। यह कृत्रिम मेधा यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से युक्त है।  यह सर्च इंजन भारतीय भाषाओं में सुनेगासमझेगा और ऑडियो वीडियो के माध्यम से जवाब भी देगा। निश्चय ही भारत का सर्च इंजन कॉमेट भारत की डिजिटल आज़ादी की ओर एक बड़ा कदम है। यदि यह प्रचलित होता है तो इसके प्रयोग से भारतवासियों के डाटा के विदेश में जाने पर रोक लगेगी और डाटा चोरी,  भारतीय तंत्र की जासूसी आदि पर भी रोक लगा सकेगी। यह भी उम्मीद की जा रही है कि इसके माध्यम से भारत के लोगों को विशेष कर कमजोर वर्ग के लोगों को भी कम दर पर अधिक डाटा उपलब्ध हो सकेगा।

यह माना जा रहा है कि कॉमेट न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी गूगल को टक्कर दे सकता है। फिलहाल इसे दक्षिण एशियामध्य एशिया और अफ्रीका आदि के 32 देश में लांच किया है। भविष्य में इसका विस्तार किए जाने की भी योजना है। कॉमेट के लॉन्च होते ही दुनिया के 100 से अधिक देशों में इसे डाउनलोड किया गया है। परप्लेक्सिटी  कंपनी एआई मोबाइल ओईएमएस के साथ साझेदारी करने की योजना बना रही है ताकि कॉमेट ब्राउजर को स्मार्टफोन में पहले से इंस्टॉल किया जा सके। यदि कॉमेट ब्राउजर स्मार्टफोन में पहले से इंस्टॉल होता है,  तो यह नए उपयोगकर्ताओं को आकर्षित कर सकता है और गूगल क्रोम की बाजार हिस्सेदारी को कम कर सकता है। परप्लेक्सिटी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अर्जिनद श्रीनिवास का कहना है कि अगर कॉमेट  उपयोगकर्ताओं के बीच फैल जाता हैऔर वे इसे क्रोम का डिफॉल्ट ब्राउजर बनाते हैंतो यह गूगल के लिए विज्ञापन राजस्व में बड़ा नुकसान हो सकता है ।

इसके लॉन्च होते ही अमेरिका की डिजिटल कंपनियों के कान खड़े हो गए हैंक्योंकि अमेरिकन डिजिटल प्लेटफॉर्मों और गूगल का सबसे बड़ा प्रयोक्ता भारत है। कयास लगाए जा रहे हैं कि कॉमेट   के लॉन्च के बाद भारत जल्द ही फेसबुकव्हाट्सैपइंस्टाग्रामट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी लेकर आएगा। ये कंपनियां कॉमेट  की चुनौती का सामना करने के लिए रणनीति बनाने में लग गई हैं। कॉमेट  के आगमन को गूगल के वर्चस्व को एक बड़ी चुनौती की तरह देखा जा रहा है। कॉमेट में इस तरह की व्यवस्था है जिससे डाटा को सुरक्षित रखा जा सकता है। यदि आने वाले समय में भारत ने अमेरिका डिजिटल प्लेटफॉर्मों को प्रतिबंधित कर स्वदेशी प्लेटफार्म का प्रयोग शुरू किया तो इससे न केवल भारत का डाटा भारत में ही रहेगा बल्कि संभावित डाटा चोरी और जासूसी पर भी रोक लगा सकेगी। इससे डिजिटल विश्व में अमेरिका का वर्चस्व भी कम हो जाएगा। लेकिन इस प्रतिस्पर्धा में गूगल जैसी कंपनियां भी बेहतर विकल्प रखने की कोशिश करेंगी।

अमेरिका ने लंबे समय से भारत सहित लगभग पूरे विश्व पर गूगल और अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से परोक्ष नियंत्रण बनाया हुआ था। इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वतंत्र होने के बावजूद डिजिटल स्व-तंत्र न होने के कारण भारत डिजिटल दासता का शिकार रहा है। डिजिटल गुलामी की स्थिति में भारत का एक विकसित देश बनना और महाशक्ति बनना संभव नहीं है। कॉमेट की लॉन्चिंग न केवल भारत की डिजिटल शक्ति बढ़ाएगी बल्कि गूगल जैसी कंपनियों के सामने भी चुनौती पेश कर सकती है। लेकिन अभी कॉमेट अपने प्रारंभिक चरण में हैआने वाले समय में पता लगेगा कि गूगल जैसे बड़े सर्च इंजनों के मुकाबले यह कितनी मजबूती से खड़ा हो सकेगा और इसकी स्वीकार्यता कितनी होगी ?

कैबिनेट ने भारत एआई मिशन के लिए 10,300 करोड़ रुपए से अधिक की मंजूरी दीएआई स्टार्टअप को सशक्त बनाएगा और कंप्यूटर इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुंच का विस्तार करेगा। केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर के अनुसार इंडियाएआई कार्यक्रम के लिए 10,300 करोड़ रुपए से अधिक की यह मंजूरी भारत के एआई पारिस्थितिकी तंत्र को उत्प्रेरित करेगी और इसे भारत और दुनिया के लिए एआई के भविष्य को आकार देने वाली शक्ति के रूप में स्थापित करेगी: उनका कहना है कि इंडियाएआई वित्तीय परिव्यय से एआई नवाचार और स्टार्टअप में भारत की अपार क्षमता को लाभ मिलेगा।

एआई ब्राउजर अथवा सर्च इंजन बनाने की दिशा में हम अभी तक कुछ नहीं कर सके हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत सरकार अथवा भारत स्थित किसी भारतीय कंपनी द्वारा भविष्य की प्रौद्योगिकी आवश्यकताओं के अनुसार आधुनिकतम एआई ब्राउजर अथवा सर्च इंजन तैयार किया जाएजिसे हम स्वदेशी एआई ब्राउजर अथवा सर्च इंजन कह सकें। इसी प्रकार चीन की तरह भारत में भी अमेरिकी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की तरह अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तैयार करने के लिए शीघ्र ठोस पहल किए जाने की आवश्यकता है। भारत के कई बड़े उद्योग समूहों और टैक कंपनियों में यह क्षमता है कि वे इस कार्य के लिए आवश्यक निवेश कर सकें और प्रौद्योगिकी का विकास कर इन कार्यों को पूर्ण कर सकें। निश्चय ही इससे भारत डिजिटल दासता से मुक्त हो कर आत्मनिर्भरशक्तिशाली और विकसित भारत बन सकेगा!

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