खुद को भगवान समझते हैं जज, आलोचना बर्दाश्त नहीं
पूर्व जज को आईना दिखाया तो कुछ पूर्व जजों को गुस्सा आया
अमित शाह के बयान पर हेट-लेटर लिखने लगी चौकड़ी
शुभ-लाभ विमर्श
इंडी गठबंधन की ओर से उपराष्ट्रपति पद के लिए मैदान में उतारे गए पूर्व न्यायाधीश बी सुदर्शन रेड्डी को नक्सलवादी विचारधारा का समर्थक बताए जाने से कुछ पूर्व जजों की चौकड़ी बौखलाई हुई है। पूर्व जजों ने सुदर्शन रेड्डी का सत्य उजागर किए जाने के खिलाफ पत्र-लेखन का कार्यक्रम शुरू कर दिया। जज खुद को ब्रह्म समझते हैं और लोकतंत्र में आलोचना से खुद को परे मानते हैं। उनके बारे में केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने सच कैसे कह दिया, इससे तमाम पूर्व जजों को मिर्ची लग गई। गृहमंत्री अमित शाह ने सुदर्शन रेड्डी को लेकर टिप्पणी क्या की, इसके बाद कई पूर्व जजों और कार्यकर्ताओं का पूरा दस्ता ही रेड्डी के बचाव में उतर पड़ा। कुछ तटस्थ और ईमानदारी पूर्व जजों ने अमित शाह के खिलाफ पत्र-लेखन को गलत बताया है और कहा है कि अमित शाह के बयान से न्यायपालिका खतरे में पड़ने नहीं जा रही।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 22 अगस्त को कोच्चि में एक कार्यक्रम में कहा था कि कांग्रेस ने वामपंथी दबाव के आगे घुटने टेक कर रेड्डी को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया। शाह ने रेड्डी को नक्सलवाद का समर्थक बताया और कहा कि छत्तीसगढ़ में माओवादियों के खिलाफ तैनात सलवा जुडूम को भंग करने का फैसला देकर उन्होंने नक्सलवाद विरोधी अभियान को छिन्न भिन्न कर दिया। अन्यथा उसी समय नक्सलवाद की समस्या समाप्त हो गई होती। अमित शाह ने कहा, विपक्ष के उपराष्ट्रपति उम्मीदवार सुदर्शन रेड्डी वही शख्स हैं, जिन्होंने वामपंथी उग्रवाद और नक्सलवाद के समर्थन में सलवा जुडूम का फैसला दिया। अगर ऐसा नहीं हुआ होता, तो 2020 तक वामपंथी उग्रवाद खत्म हो गया होता। उन्होंने केरल के लोगों को याद दिलाया कि उनका राज्य भी नक्सलवाद और उग्रवाद का दंश झेल चुका है। शाह ने तर्क दिया कि कांग्रेस ने अपने वामपंथी सहयोगियों के दबाव में ऐसे व्यक्ति को ऊंचा पद दिया, जिससे उसका असली वैचारिक झुकाव जाहिर होता है।
तटस्थ राजनीतिक समीक्षक भी यह मानते हैं कि अमित शाह का बयान न्यायपालिका के खिलाफ नहीं था, बल्कि यह एक प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार की पृष्ठभूमि को लेकर सटीक राजनीतिक आलोचना थी, जो लोकतांत्रिक चुनावों में बिल्कुल सामान्य है। आलोचना से जजों और कार्यकर्ताओं के समूह को इतनी मर्मांतक चोट क्यों लगी, इसे समझने के लिए 2011 के सलवा जुडूम वाले फैसले को देखना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस रेड्डी और निज्जर की बेंच ने छत्तीसगढ़ सरकार की उस नीति को रद्द कर दिया था, जिसमें आदिवासी युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनाकर माओवादियों से लड़ने के लिए हथियार दिए गए थे। नंदिनी सुंदर और अन्य वामपंथियों ने राज्य सरकार के इस फैसले के खिलाफ याचिका दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर कार्रवाई की और सरकार को आदेश दिया कि वह इस बल को भंग करे, सभी हथियार वापस ले और युवाओं को माओवादी जवाबी हमलों से बचाए। फैसले में यह भी कहा गया था कि सलवा जुडूम या कोया कमांडो कहलाने वालों द्वारा किए गए मानवाधिकार उल्लंघन और अपराधों की जांच हो। बेंच ने साफ किया कि कोई भी समूह कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकता या संविधान से बाहर काम नहीं कर सकता। बेंच ने कहा था, किसी बल की प्रभावशीलता यह तय करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती कि वह संवैधानिक रूप से जायज है।
यह फैसला राज्य सरकार और केंद्र सरकार के लिए बड़ा झटका था, क्योंकि तमाम खामियों के बावजूद सलवा जुडूम माओवादियों के गढ़ में उनका मुकाबला करने का एकमात्र तरीका था। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने सुरक्षाबलों को कमजोर कर दिया। शाह का तर्क सीधा है, अगर न्यायपालिका ने दखलंदाजी नहीं की होती तो नक्सलवाद के खिलाफ जंग 2020 तक खत्म हो सकती थी।
अमित शाह के बयान के दो दिन बाद 24 अगस्त को कुछ रिटायर्ड जजों और कार्यकर्ताओं ने एक पत्र जारी कर शाह पर हमला बोला। उन्होंने शाह पर फैसले को गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगाया और कहा कि उस फैसले ने कभी नक्सलवाद का समर्थन नहीं किया। उन्होंने नसीहत दी कि ऊंचे पदों के लिए प्रचार गरिमा के साथ और विचारधारा पर सवाल उठाए बिना करना चाहिए। पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मदन लोकुर, जे. चेलमेश्वर, कुरियन जोसेफ, अभय ओका, एके पटनायक, गोपाल गौड़ा, विक्रमजीत सेन, हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर, एस मुरलीधर, संजीव बनर्जी, हाईकोर्ट के पूर्व जज सी प्रवीण कुमार, ए गोपाला रेड्डी, जी रघुराम, के कन्नन, के चंद्रू, बी चंद्रकुमार, कैलाश गंभीर के साथ-साथ वकील संजय हेगड़े और प्रोफेसर मोहन गोपाल शामिल हैं। पत्र का लहजा इतना फूहड़ था कि उसमें पूर्व न्यायाधीशों की शाब्दिक-मर्यादा कहीं नहीं दिखाई पड़ती, जबकि वे दूसरों से पूरी मर्यादा की अपेक्षा रखते हैं। पत्र में लिखा गया कि एक नेता की हिम्मत कैसे हुई कि वो न्यायाधीश के फैसले पर बयान दे दे। पत्र लिखने वाले पूर्व जजों ने चेतावनी दी कि अमित शाह के शब्दों से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है। यानि, मि-लॉर्ड्स की कोई आलोचना न करे, भले ही कोई पूर्व जज राजनीति के गंदे खेल में उतर चुका हो।
इन पूर्वाग्रही जजों के जवाब में भी कुछ जज सामने आओ और पूर्व जजों को मर्यादा में रहने की सीख दी। उन्होंने कुछ रिटायर्ड जजों की उस आदत को भी उजागर किया, जिसमें वे न्यायपालिका की स्वतंत्रता की आड़ में पक्षपात छिपाते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि जैसे ही जस्टिस रेड्डी ने उपराष्ट्रपति का चुनाव लड़ने का फैसला किया, वे राजनीति में उतर गए और उन्हें अपने रिकॉर्ड का बचाव करना होगा, जैसे बाकी उम्मीदवार करते हैं। यह जवाबी बयान इसलिए अहम है, क्योंकि इसने यह धारणा तोड़ दी कि अमित शाह की आलोचना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला है। उन्होंने तर्क दिया कि आलोचना से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरा नहीं होता। असल नुकसान तब होता है, जब रिटायर्ड जज बार-बार पक्षपातपूर्ण राजनीतिक बयान देते हैं, जिससे लगता है कि पूरी संस्था ही किसी एक राजनीतिक पक्ष के साथ खड़ी है। उन्होंने कहा कि कुछ जजों की गलती की वजह से पूरी जजों की बिरादरी को पक्षपातपूर्ण गिरोह के रूप में देखा जाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह न तो न्यायपालिका के लिए अच्छा है और न ही लोकतंत्र के लिए।
यही असली मुद्दा है। रिटायर्ड या मौजूदा जज भगवान नहीं हैं। वे पैगंबर नहीं हैं। वे इंसान हैं, जिनके फैसलों ने लाखों लोगों की जिंदगी पर असर डाला है। ऐसे फैसले खासकर जो राष्ट्रीय सुरक्षा नीति को बदल दें, जरूर उनकी आलोचना होगी। यही लोकतंत्र का सार है। लेकिन भारत में मि-लॉर्ड्स को लगता है कि वे ऐसी किसी भी आलोचना से परे हैं। उन्हें लगता है कि उनके फैसलों की आलोचना संविधान पर हमला है। इससे ज्यादा अलोकतांत्रिक कुछ हो ही नहीं सकता। अगर राजनेता, नौकरशाह और मीडिया की सार्वजनिक आलोचना होती है, तो राजनीति में उतर चुके जज को आलोचना से छूट क्यों मिलनी चाहिए?
अभिव्यक्ति की आजादी कोर्ट रूम के दरवाजे पर खत्म नहीं होती। लोकतंत्र की मांग है कि नागरिकों की सुरक्षा पर असर डालने वाले फैसलों की खुलकर आलोचना हो। अमित शाह का बयान भले ही राजनीतिक रूप से तीखा था, लेकिन यह माओवादी उग्रवाद के रास्ते पर एक पुराने फैसले के प्रभाव पर जायज टिप्पणी थी। इसे गलत व्याख्या या गलत प्रभाव देने वाला कहना, व्याख्या पर एकाधिकार की मांग है, जैसे कि केवल न्यायपालिका को ही अपने शब्दों को समझाने का हक है। यह पाखंड तब और साफ हो जाता है, जब रिटायर्ड जज खुद न्यायपालिका की स्वतंत्रता की आड़ में राजनीतिक घोषणापत्र जारी करते हैं। एक तरफ किसी एक राजनीतिक खेमे के साथ पूरी तरह जुड़े पत्रों पर हस्ताक्षर करना और दूसरी तरफ यह शिकायत करना कि किसी राजनेता की आलोचना पक्षपातपूर्ण है यह दोगलापन है और जनता इसे समझती है।
यह विवाद सिर्फ अमित शाह बनाम जस्टिस रेड्डी का नहीं है। यह लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका के बारे में है। जैसे ही जज राजनीति में कदम रखते हैं, उन्हें स्वीकार करना होगा कि उनके रिकॉर्ड की जांच होगी। उनके फैसलों, खासकर जो राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों को बदलते हैं, की पड़ताल होगी और उनके वैचारिक झुकाव को जनता के सामने उजागर किया जाएगा। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला नहीं, बल्कि जवाबदेही की कीमत है। न्यायपालिका सम्मान की हकदार है, लेकिन तभी जब वह राजनीति से ऊपर रहे। जब इसके रिटायर्ड सदस्य राजनीतिक किरदार की तरह व्यवहार करते हैं, तो वे आलोचना से छूट नहीं मांग सकते। अगर लोकतंत्र का कोई मतलब है, तो वह यह कि कोई भी संस्था या व्यक्ति सवालों से परे नहीं है।
तो मि-लॉर्ड्स! जो लोग भी आलोचना होते ही हाय-तौबा मचाने लग जाते हैं, उन्हें यह याद दिला दिया जाए कि आप भगवान नहीं हैं और न ही आप सवालों से परे हैं। लोकतंत्र आपके हिसाब से काम नहीं करता, बल्कि वो जनता के हिसाब से काम करता है।
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