मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक चल रहा सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने 16 साल की लड़की की शादी को वैध ठहराया
सुप्रीम कोर्ट ने ताक पर रख दिया संविधान और कानून
मतदान की उम्र 18 साल, पर शादी की उम्र 16 साल!
नई दिल्ली, 20 अगस्त (एजेंसियां)। जिस देश में वोट डालने की परिपक्वता-उम्र 18 वर्ष निर्धारित की गई है, उसी देश का सुप्रीम कोर्ट 16 वर्ष की कम उम्र में हुई किसी लड़की की शादी को पूरी तरह कानूनी घोषित कर देता है। जिस भारत देश का अपना संविधान और कानून है, उस देश में सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम पर्सनल लॉ के नियमों का हवाला देते हुए 16 साल की बच्ची की शादी को वैध करार देता हो, उसके बारे में क्या कहा जाए! यह अच्छा संकेत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का यह बेजोड़ फैसला यही बताता है कि भारतीय संविधान और कानून से अधिक संगत मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधान हैं। यह तब हो रहा है जब देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की आवश्यकता महसूस की जा रही हो। फिर एक्टिविज्म पर उतारू सुप्रीम कोर्ट को मतदान की उम्र भी तत्काल प्रभाव से 16 वर्ष कर देनी चाहिए, या उसे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से इस बारे में निर्देश लेना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने 16 साल की नाबालिग मुस्लिम लड़की की शादी को वैध करार दिया है। यह फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की याचिका खारिज कर दी। एनसीपीसीआर ने पंजाब और हरियाणा हरियाणा हाई कोर्ट द्वारा 16 साल की मुस्लिम लड़की की शादी को कानूनी तौर पर वैध करार देने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को याचिका दाखिल करने का अधिकार नहीं है।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी जिसमें हाई कोर्ट ने 16 साल की मुस्लिम युवती की शादी को कानूनी तौर पर वैध करार दिया था। हाई कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर शादी को वैध करार दिया था। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग का कहना था कि यह फैसला बाल विवाह निषेध कानून 2006 के विपरीत है। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर इस शादी को वैध करार देते हुए एक मुस्लिम जोड़े को सुरक्षा प्रदान की थी।
उल्लेखनीय है कि पॉक्सो एक्ट के तहत 18 साल से कम उम्र की लड़की से शारीरिक संबंध बनाना अपराध है, भले ही वह लड़की की सहमति से बनाया गया हो। शादी से जुड़े अधिकतर कानूनों में भी लड़की की शादी की उम्र 18 वर्ष रखी गई है, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ में यौवन अवस्था (प्युबर्टी) हासिल कर चुकी लड़की के विवाह को सही माना गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत यह विवाह बाल विवाह की श्रेणी में नहीं आता। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कानून का कोई कानूनी प्रश्न नहीं उठता है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि एक नाबालिग मुस्लिम लड़की की शादी को जायज ठहराने वाले हाई कोर्ट के आदेश को राष्ट्रीय बाल आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। पॉक्सो के तहत नाबालिग लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाना अपराध है और मजहब के आधार पर बालिकाओं के यौन शोषण को अनुमति देना धर्म निरपेक्षता संवैधानिक सिद्धांत के विरुद्ध है। उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी शादी को बच्चों के भविष्य के लिए खतरा बताया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में फिर सुनवाई हुई। अब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी कुछ ही अर्सा पहले का अपना निर्णय बदल दिया और कहा कि अब यह शादी वैध है। सुप्रीम कोर्ट ने एनसीपीसीआर की याचिका भी खारिज कर दी।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर कहते हैं कि यह बिल्कुल शरिया के आधार पर देश चलाने जैसा है। सुप्रीम कोर्ट ने शादी के लिए नाबालिग की सहमति को आधार माना है यह चिंताजनक है। इसी तरह के एक और मामले में कल फिर सुनवाई होनी है। यदि बच्चों को सेक्स की सहमति दे दी गई तो देश समाज की बर्बादी सुनिश्चित है।
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