न्यायिक सक्रियता न्यायिक आतंकवाद नहीं बननी चाहिए

 राष्ट्रपति-राज्यपाल को निर्देश देने के उतावलेपन पर बोले सीजेआई

 न्यायिक सक्रियता न्यायिक आतंकवाद नहीं बननी चाहिए

निर्वाचित लोकसेवकों को कम नहीं आंकना चाहिए तुषार मेहता

एक देश, एक चुनाव प्रक्रिया संविधान सम्मत है: जस्टिस खन्ना

नई दिल्ली, 21 अगस्त (एजेंसियां)। राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयक को मंजूरी देने की समय सीमा तय करने के मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायिक सक्रियतान्यायिक आतंकवाद नहीं बननी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने सख्त शब्दों में कहा कि न्यायिक सक्रियता कभी भी न्यायिक आतंकवाद या न्यायिक दुस्साहसिकता में नहीं बदलनी चाहिए। गुरुवार को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि निर्वाचित लोगों को काफी अनुभव होता है और उसे कमतर नहीं आंका जाना चाहिए। इस पर मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस बीआर गवई ने कहा, हमने कभी भी निर्वाचित लोगों के बारे में कुछ नहीं कहा है। मैंने हमेशा कहा है कि न्यायिक सक्रियताकभी भी न्यायिक आतंकवाद या न्यायिक रोमांच नहीं बनना चाहिए।

पीठ में सीजेआई जस्टिस गवई के अलावा जस्टिस सूर्यकांतजस्टिस विक्रम नाथजस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदूरकर भी शामिल हैं। तुषार मेहता ने अपने सबमिशन में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दियाजिसमें राज्यपालों की शक्तियों पर बात की गई। इस मामले पर सुनवाई लगातार तीसरे दिन भी जारी रही। मेहता ने कहा कि निर्वाचित लोग सीधे तौर पर जनता का सामना करते हैं। अब लोग जनप्रतिनिधियों से सवाल करते हैं। 20-25 साल पहले हालात अलग थे। अब मतदाता जागरूक हैं और उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता। सॉलिसिटर जनरल मेहता ने सुनवाई के दौरान कहा कि राज्यपाल द्वारा असेंट रोकना (विदहोल्डिंग असेंट) संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत एक स्वतंत्र और पूर्ण अधिकार है। इसे सीमित करने या उस पर समय सीमा तय करने से संविधान का संतुलन बिगड़ जाएगा। मेहता ने कहा कि राज्यपाल के पास मंजूरी रोकने का पूरा अधिकार हैजो उन्हें संविधान के अनुच्छेद 200 से मिला हुआ है। बुधवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर कोई विधेयक दूसरी बार राज्यपाल की मंजूरी के लिए उनके पास भेजा जाए तो राज्यपाल उसे राष्ट्रपति के पास विचार करने के लिए नहीं भेज सकते।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने सरकार से पूछाक्या राज्यपाल को किसी कानून (विधेयक) को हमेशा के लिए रोके रखने की अनुमति दी जा सकती हैअगर हांतो क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि एक निर्वाचित सरकार हमेशा राज्यपाल की व्यक्तिगत पसंद या इच्छा पर निर्भर रहेगी? मुख्य न्यायाधीश ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सवाल कियालेकिन तब क्या हम राज्यपाल को अपीलों पर सुनवाई करने का पूरा अधिकार नहीं दे रहे होंगे? बहुमत से चुनी गई सरकार राज्यपाल की इच्छा पर निर्भर हो जाएगी।  पीठ ने कहा कि अगर यह मान लिया जाए कि राज्यपाल द्वारा पहली बार रोकते ही कोई विधेयक खत्म हो जाता हैतो यह न तो राज्यपाल की शक्ति के लिए ठीक होगा और न ही पूरी कानून बनाने की प्रक्रिया के लिए।

तुषार मेहता ने कहा कि राज्यपाल के पास चार विकल्प होते हैं, विधेयक को स्वीकृति देनाउसे रोकनायदि वह किसी केंद्रीय कानून से टकराता है तो राष्ट्रपति को भेजनाया फिर पुनर्विचार हेतु राज्य विधानमंडल को लौटाना। मेहता के अनुसार स्वीकृति रोकना कोई अस्थायी प्रक्रिया नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय की पांच और सात न्यायाधीशों वाली पीठें पहले ही इसकी व्याख्या कर चुकी हैं कि इस स्थिति में विधेयक अस्वीकृत माना जाएगा। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, मान लीजिए कोई सीमावर्ती राज्य विदेश मामलों से जुड़ा विधेयक पारित करता है और उसमें यह प्रावधान होता है कि हम किसी देश के लोगों को प्रवेश देंगे या नहीं। ऐसी स्थिति में राज्यपाल उसे मंजूरी नहीं दे सकतेन ही राष्ट्रपति को भेज सकते हैंक्योंकि यह असहमति का मामला नहीं है। और अगर सदन में उसे दोबारा भेजा जाए और वहां से फिर पारित हो जाएतो उसे मना भी नहीं कर सकते। ऐसे में उन्हें विधेयक रोकना ही होगा। यह शक्ति बहुत कम और संयम से प्रयोग की जानी चाहिएलेकिन संविधान ने इसे उपलब्ध कराया है।

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दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट के निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने एक देश, एक चुनाव प्रक्रिया का समर्थन करते हुए कहा है कि यह व्यवस्था संविधान की बुनियादी संरचना का उल्लंघन नहीं करती है। संसदीय समिति की बैठक में पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने विधेयक की संवैधानिक वैधताव्यावहारिक पहलुओं और चुनाव आयोग की भूमिका पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि यह विधेयक भारतीय संविधान की बुनियादी संरचना का उल्लंघन नहीं करता, न ही इसका स्वरूप या उद्देश्य संविधान में प्रत्यक्ष रूप से कोई संशोधन करता है। उन्होंने यह भी कहा कि यह प्रस्ताव संवैधानिक रूप से अनुमेय हैबशर्ते उसमें आवश्यक सुरक्षा उपायों और संतुलन का ध्यान रखा जाए।

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