सर्वदलीय बैठक में विपक्ष का तीखा तेवर, सरकार के सामने उठाए अहम मुद्दे

 — शीतकालीन सत्र की रणनीतियों पर जमकर चर्चा

सर्वदलीय बैठक में विपक्ष का तीखा तेवर, सरकार के सामने उठाए अहम मुद्दे


नई दिल्ली, 29 नवम्बर,(एजेंसियां)।संसद के शीतकालीन सत्र से ठीक पहले केंद्र सरकार द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में रविवार को राजनीतिक गर्माहट साफ दिखाई दी। बैठक का उद्देश्य था आगामी सत्र की कार्यवाही को सुव्यवस्थित करना और दलों के बीच सहयोग की बुनियाद मजबूत करना, लेकिन विपक्ष ने इस मौके का इस्तेमाल सरकार पर दबाव बनाने और अपने तीखे तेवर दिखाने के लिए किया। वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों, हालिया दिल्ली बम धमाकों, विदेश नीति और संसद के सत्र की कम अवधि जैसे मुद्दों को विपक्ष ने जोरदार तरीके से उठाया। दूसरी ओर, सरकार ने विपक्ष से संयम और सहयोग की अपील की ताकि सत्र के दौरान विधायी कार्य सुचारू रूप से पूरे हो सकें।

इस बैठक में सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेता शामिल हुए। सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने नेतृत्व किया, जिन्होंने शुरुआत में ही सभी दलों से आग्रह किया कि सत्र के दौरान गरमागरम राजनीतिक टकराव से बचते हुए रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए। रिजिजू ने कहा कि ठंड के मौसम में "ठंडे दिमाग" से काम करने की जरूरत है ताकि देशहित से जुड़े महत्वपूर्ण बिल पास हो सकें और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं प्रभावित न हों।

बैठक का माहौल शुरुआत में शांत दिखाई देता था, लेकिन जैसे ही विपक्षी दलों के नेताओं ने अपने मुद्दे उठाने शुरू किए, बैठक तेजी से राजनीतिक रंग लेने लगी। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, समाजवादी पार्टी और वाम दलों ने सामूहिक रूप से अपनी चिंता जाहिर की कि सरकार संसद के सत्रों की अवधि लगातार कम कर रही है, जिससे विधायी कार्यों पर चर्चा और बहस सीमित होती जा रही है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर सत्र को छोटा रखकर ‘संसद को पटरी से उतारने’ की कोशिश कर रही है, ताकि महत्वपूर्ण मुद्दों पर विपक्ष अपनी बात विस्तार से न रख सके।

शीतकालीन सत्र इस बार 15 बैठकों का होगा, जो कि हाल के वर्षों में सबसे छोटे सत्रों में से एक माना जा रहा है। सामान्य परिस्थितियों में संसद के शीतकालीन सत्र में लगभग 20 बैठकें होती हैं, लेकिन इस बार कई विधायी कार्यक्रमों और राजनीतिक व्यस्तताओं के कारण सत्र की अवधि कम रखी गई है। विपक्ष का मानना है कि इससे लोकतांत्रिक संवाद और जवाबदेही पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

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वोटर लिस्ट के मुद्दे पर भी विपक्ष ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया। कई दलों ने दावा किया कि हाल ही में निर्वाचन आयोग द्वारा की जा रही वोटर लिस्ट की 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' प्रक्रिया में व्यापक गड़बड़ियां सामने आई हैं। विपक्ष ने इसे चुनावी पारदर्शिता के लिए खतरा बताते हुए संसद में इस पर व्यापक चर्चा कराने की मांग की। इसी क्रम में यह भी कहा गया कि देश के कई राज्यों में मृत लोगों के नाम वोटर लिस्ट में मौजूद हैं, जबकि कई योग्य मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा चुके हैं। विपक्ष का आरोप है कि यह एक “सिस्टमेटिक समस्या” बन चुकी है, जिसे सरकार गंभीरता से नहीं ले रही है।

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दिल्ली में हाल ही में हुए बम धमाके पर भी विपक्ष ने चिंता जताई। विपक्षी दलों ने सवाल उठाया कि केंद्र सरकार की सुरक्षा एजेंसियां ऐसी घटनाओं को रोकने में क्यों विफल हो रही हैं। उन्होंने मांग की कि इस विषय पर संसद में विस्तृत चर्चा हो और सरकार बताए कि वह भारत की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कौन-कौन से कदम उठा रही है। विपक्ष ने आरोप लगाया कि विदेश नीति और सुरक्षा रणनीतियों में भी सरकार समन्वय की कमी से जूझ रही है, जिसका असर देश की सुरक्षा पर पड़ सकता है।

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विदेश नीति के मुद्दे पर भी कई विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाए। विपक्ष के अनुसार भारत की पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक स्थितियां कई चुनौतियों से गुजर रही हैं, और संसद को इनकी जानकारी और रणनीति पर चर्चा करना अत्यंत आवश्यक है। चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा और सुरक्षा मुद्दों पर विपक्ष ने सरकार की रणनीतियों पर सवाल उठाए, साथ ही बांग्लादेश और नेपाल के साथ हाल के तनावपूर्ण हालातों पर भी प्रतिक्रिया मांगी। विपक्ष ने कहा कि संसद को इन मुद्दों पर गहन और सार्थक चर्चा के बिना कानून पारित करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।

दूसरी ओर सरकार ने अपना एजेंडा स्पष्ट करते हुए कहा कि वह इस सत्र में कुल 14 महत्वपूर्ण विधेयक प्रस्तुत करने जा रही है। इन विधेयकों में परमाणु ऊर्जा बिल 2025 शामिल है, जिसका उद्देश्य परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी निवेश और भागीदारी को बढ़ावा देना है। सरकार का मानना है कि भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में यह बिल गेम-चेंजर साबित होगा।

उच्च शिक्षा आयोग विधेयक 2025 भी इस सत्र में पेश किया जाएगा, जिसके तहत देश में एक केंद्रीय उच्च शिक्षा आयोग बनाया जाएगा। इसका उद्देश्य विश्वविद्यालयों के बीच समन्वय बढ़ाना, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना और उच्च शिक्षा में पारदर्शिता स्थापित करना है। यह बिल इस समय चल रहे कई विश्वविद्यालय अनुदान ढांचों की जगह लेगा और उच्च शिक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव लाएगा।

दिवाला एवं दिवालियापन संहिता (संशोधन) विधेयक, कंपनी अधिनियम में संशोधन, सेबी कानूनों में बदलाव और राष्ट्रीय राजमार्ग (संशोधन) विधेयक जैसे कई बड़े बिल भी सूचीबद्ध हैं। विशेष रूप से राष्ट्रीय राजमार्ग विधेयक में भूमि अधिग्रहण को पारदर्शी और त्वरित बनाने की दिशा में बड़े प्रावधान शामिल किए गए हैं, जिससे हाईवे निर्माण की गति और कार्यक्षमता में इजाफा होगा।

सर्वदलीय बैठक के अंत में सरकार ने उम्मीद जताई कि विपक्ष रचनात्मक सहयोग देगा, जबकि विपक्ष ने भी अपनी मांगों को दोहराया कि संसद को "जनता की आवाज" और "जवाबदेही के मंच" के रूप में स्वतंत्र रूप से काम करने देना चाहिए। राजनीतिक कटुता के बीच हुई यह बैठक, आगामी शीतकालीन सत्र में संभावित गर्मागर्म बहसों और व्यापक राजनीतिक संघर्षों की झलक पहले ही दिखा चुकी है।